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साहस, पहल, प्रयोग


हिंसा और अहिंसा के बारे में तात्विक मतभेद रखने के बाबजूद । इसलिए जयप्रकाश जी ने नक्सलवादियों को उस समय कहा था कि भई आप इतना तो समझिए कि सत्ता की हिंसा की ताकत आपकी हिंसा की ताकत से ज्यादा ही रहेगी। ऎसी स्थिति में हिंसा का प्रयोग करके क्या हासिल कर लेंगे। उलटा निर्दोष लोगों को आप जरूर मरवा देंगे। इससे तो बच सकते हैं । तो अराजकतावादी ताकतों के प्रयास और हमारे प्रयास में यहीं बुनियादी अंतर है। अंतिम व्यक्ति के हक और हित के संरक्षण और संपोषण की तीव्र इच्छा, समान इच्छा के बावजूद हमारे और उनके बीच यह अंतर है । ऐसा हम समझते है । हमारा अपना आग्रह है साधन शुचिता, जीवन शुचिता पर हमारा आग्रह है विकेंद्रीकरण पर । तो विकेंद्रीकरण , साधन शुचिता और जीवन शुचिता को हम अपना केंद्र बिंदु मानते है। इसके कारण हम कुछ लोगों से अलग दिखते हैं तो कोई हर्ज नहीं और कुछ लोग जैसे दिखते है इसमें भी कोई हर्ज नहीं है। हम मानते है कि सार्थक बदलाव के लिए बौद्धिक, रचनात्मक और आंदोलनात्मक तीनों प्रयोगों की जरूरत है और तीनों प्रयासों में लगे हुए लोगों को जोड़ने की भी जरूरत है। तीनों प्रयासों को चोटी के समान गूँथ देने को जरूरत है और ये सब अगर होना है तो स्वाभाविक है कि विकंद्रीकरण के अनुरूप हमारा इलाका, हमारी दुनिया, हमारा गांव हमारी दुनिया, हमारा जिला हमारी दुनिया, फिर हमारा देश हमारी दुनिया की बात करनी होगी। "थिक ग्लोबली, एक्ट लोकली ' के आधार पर अपने इलाके के साधन, प्रतिभा और परिश्रम का उपयोग करते हुए सबको भोजन, सबको काम का लक्ष्य लेकर चलना होगा। रोटी, कपड़ा, मकान, पढाई, दबाई, पेयजल , ऊर्जा आदि के रूप में आमजन की जो न्यूनतम आवश्यकताएं है, उसे पूरा करने के लिए गांव, खेत, किसान सब एक साथ कैसे जुडें, यह एक चुनौती है। इसमें बिना गांव के न खेत बचेंगें, न किसान बचेंगें और न गाय बचेगी, इन सब बातों को पिछले तीन वर्षों में हम काफी कूछ समझ चुके हैं । हमने यह तय किया है कि आज जो चुनोतियां है उनसे हम साहस, पहल और प्रयोग के आधार पर लड़ेंगे । डेढ़-दो सौं वर्षों से चली आई दुनिया की मानसिकता में आदेश, आज्ञापालन की कार्य संस्कृति का जोर है। इसकी काट के रूप में हमने संवाद, सहमति और सहकार की बुनियाद पर साहस, पहल ओर प्रयोग का .सूत्र ढूंढा है। हम मान कर चलेंगे कि हममें से प्रत्येक के पास सच का एक टुकडा ही है। पूरा सच अभी किसी की अभिव्यक्त नहीं हुआ है। तो हम अपने टुकडे के प्रति आग्रह तो रखें , लेकिन दूसंरे के हाथ में भी सच का टुकड़ा है इसे महसूस करें। कहने का मतलब यह है किं अपनी बात का आग्रह रखने के साथ-साथ मतभेदों के प्रति आदर करना भी सीखें। हो सकता है कि उसने वहा जो किया, वह वहां के लिए ठीक हो। हम अपने लिए जो ठीक समझते है, वह हम जरुर करें। यहाँ फिर विश्वास ओर संवाद को जरूरत पड़ेगी । उसी आधार पर जब हम आगे बढेंगे तो ज्यादा लोग जुड़ेगें । और एक दूसरे से सीखेंगे-समझेंगे भी। इस कार्य पद्धति को हम लोगों ने पूरी तरह से अपनाया है। यहाँ आप लोगों को चार संस्थाओं ने बुलाया है, जयजगत सेवा संस्थान, सुरभि शोध संस्थान, कौटिल्य शोध संस्थान और राष्टीय स्वाभिमान आंदोलन । इससे लोग इकट्रठा हुए। यहां किसी ने अपनी संस्था के वजूद खोने की बात नहीं की है। ये संब मिलाकर संगम है। संगम में लोग अपनी-अपनी पोटरी -गठरी लेकर आते हैं। उसी में खुद खाते हैं और दान-पुण्य भी करते हैं । वे रहें किसी भी टेंट में, लेकिन अपनी चटाई साथ रखते हैं। लोग संगम में अतिथि बनकर नहीं जाते। संगम का यह पारंपरिक रूप ही भारत विकास संगम का आदर्श है। इन तीन दिनों में सबसे जाना और सीखा है। इसलिए आप सबने एक दूसरे से मोबाइल नंबर भी मांगा पता भी मांगा । हम भी आए हुए लोगो के बारे में जानकारी को सहेजने की कोशिश कर रहे है ।

मित्रों कुंभ के दौरान जो संगम स्नान होता है उसंमें क्या कोई 'कार्यक्रम समिति बनती है, कोई नियंत्रक बनता है, लिखित कार्यक्रम का क्या कोई फोटोस्टेट सबको दिया जाता है उसमें सत्रों का कोई विभाजन होता है? नहीं होता है। क्योंकि वह संभव ही नहीं है। आपने अनुभव किया होगा की लोग कि यहां नब्बे-सौ प्रकल्प के लोग तो चले आए, अब कराइए सबका प्रजेंटेशन और भाषण । प्रजेंटेशन करते-करते कंप्यूटर फेल हो जाए तो क्या करेंगे । हरेक को लग सकता है कि अरे यार हम भी कुछ बात बोलते तो अच्छा होता। यहा 20-25 लोग बोले, उसी में आयोजकों को पसीना आ गया । वास्तव में भारत विकास संगम को, कुंभ मेले की भावना .से आप लेंगे तभी बात बनेगी । जैसे वहां लोग आते है और अपनी रुचि के अनुसार किसी संत के साथ बैठकर सत्संग कर लेते हैं। किसी से जाकर कोई और बात पूछ लेते हैं। कहीं भंडार में जाकर खा लेते हैं। चारों और प्रसाद ही प्रसाद हैं। सब स्नान भी कर लते हैं। स्नान के लिए आने वाले ग्रामीण कुंभ की व्यवस्था के बारे में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराते।

भारत विकास संगम हमारे लिए आत्मावलोकन का भी एक मौका है। हमें यह समझना चाहिए कि हम प्राय: एक सीमित और प्रतिबद्ध समूह के बीच सिमट कर रह जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि व्यक्ति से बडा दल, दल से बडा देश, व्यक्ति से बड़ा संगठन, संगठन से बड़ा समाज । हम बहुत बड़े समाज को अपनी अंजुरि में लेने की कोशिश करेंगे तो समस्याएं खड़ी होंगी । यदि हम समझ लें कि हमारी अंजुरि में समाने वाला सूरज नहीं होता तो परेशानी नहीं होगी। समाज की ताकत हमसे ज्यादा है, उसकी परंपरा हमसे अधिक शक्तिशाली है। अरे हमारा जीवन ही कुल मिलाकर 80-85 साल का होता है, जबकि इस समाज की जीवन यात्रा तो बहुत पुरानी हैं। हम उसको चला रहें है या चला सकते है, यह कोरा दंभ ही कहा जाएगा। यदि हम समाज के साथ कुछ कदम मिलाकर चल सके तो यही बड़ी बात हैं। इस दिशा में जब हम सोचते है तो अपनी कार्यपद्धति ध्यान में आती है। उसमें से ही संवाद सहमति, साकार, साहस, पहल और प्रयोग पर आग्रह बढ़ता जाता हैं। उसी में फिर मातृ शक्ति , संत शक्ति , युवा शक्ति और विचार शक्ति इन सब का मेल हो जाए, यह इच्छा उत्पन्न होती हैं। फिर हमको ध्यान में आता है कि राजसत्ता और अर्थसत्ता पर समाज़सत्ता और धर्मसत्ता हावी कैसे हो, इसके लिए कुछ करना चाहिए। इसमें से ध्यान में आता हैं - हमारा जिला हमारी दुनिया। इसके लिए जरूरी है कि सही सोच के साथ प्रत्येक जिले में काम करने के लिए कुछ व्यक्ति। कोई अपने जिले में काम करने वाले अन्य समूहों के साथ संपर्क स्थापित करे। कोई संपर्क कार्यालय का काम देख कोई संगम में बताए गए रचनात्मक कामों को देखे। एक व्यक्ति स्वाभिमान आदोलन के नाते से सोचना शुरू करे। एक व्यक्ति साधन संग्रह को बात देखे। एक आदमी भारतीय पक्ष का काम देखे । ऐसे मिला-जुला कर दस-बारह लोग एक जिले में जब हो जायें तब काम में गति आएगी। लेकिन कुछ करने के पहले हमें अपने जिले को जानना बहुत जरूरी है। जैसे झाबुआ जिले के बारे में जानकारी जुटाई गई बैसे ही आप भी अपने-अपने जिलों की जानकारी जुटाएं । आप अपने जिले की परम्परा को समझ लें, जैसे विनोद यादव ने वैशाली जिला में कौन-कौन महापुरुष हुए है यह दूंढ निकाला है। उन्होंने पता लगाया कि दुल्हन को स्थानीय नबाब के यहाँ भेजने की कुरीति को किसने चुनौती दिया वो कौन बाप था जिसने तय किया कि उसकी बेटी की डोली नवाब के घर पर नहीं रुकेगी । पालकी में वह खुद बैठा, पालकी ले जाने वाले उसके ही साथी वीर नवाब के घर पहुंच कर वे सभी तो मरे लेकिन उस नवाब और उसके सारे कारिंदों को मार कर । ऐसी एक नहीं हजारों उज्जवल परम्पराएं प्रत्येक जिले में बिखरी पडी हैं। यहाँ हर कंकर शंकर हैं। हरेक ढेले में एक-एक कहानी है। हमारी उज्जवल परंपरा की दास्तान एक -एक पेड़ कहता है। बरेली में जाकर देखता हूँ तो एक पेड़ के पास 252 नाम लिखे हुए हैं। कोई कोयरी है, कोई पासी है, कोई लोहार है , कोई बढ़ई है, कोई मोची है। उन लोगों को 1857 में इकटठे फांसी पर चढाया गया था । हम जरा झाक कर देखे तो एक-एक जिले की यश कीर्ति हमें मिल जाएगी। हमें तो लोगों को जगाना भर है। इसके लिए महापुरुषों से जुडी तिथियों पर जनता के बीच जाकर कुछ कार्यक्रम करना चाहिए। 1857 की कीर्ति गाथा के स्थानीय नायकों को हमें ढूँढना चाहिए और उनके बलिदान स्थलों पर स्मारक खड़ा करना चाहिए। इसके लिए हम साधन भी वहीं से जुटाए। बाहर से पैसा ले जाकर हम शानदार स्मारक बनाएं, इसकी कोई ज़रूरत नहीं है । स्थानीय स्तर पर संसाधन जुटाने में यदि दिकक्त हो तो हम उनके नाम पर एक पेड़ लगाकर चबूतरा ही बना दें। यह सब करने से स्थानीय लोगों का स्वाभिमान जागेगा और लोग ताल ठोंककर व्यवस्था से हिसाब मांगने के लिए आगे आएंगे ।

हमें जनहित में काम करने के नए-नए तरीके विकसित करने होंगे। वर्तमान व्यवस्था में जो भी सकारात्मक बातें है, उनका उपयोग करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। सूचना का अधिकार कई कमियों के बावजूद जनहित में काम करने वालों के लिए अच्छा उपकरण बन सकता हैं। इसलिए हर जिले में कम से कम एक व्यक्ति सूचना के अधिकार को लेकर काम करें ता अच्छा होगा। इसी तरह हर जिले में गौ हत्या बंदी के लिए भी कुछ करना चाहिए। इसके लिए वकीलों की टीम बनाने के साथ -साथ प्रशासन के अधिकारियों से पूर्व वार्ता करना उपयोगी रहेगा। फिर ये भी सही है कि गोशाला बनाकर या गोहत्या बंद कराके गौसंरछण नहीं किया जा सकता। अत: किसान के खूंटे से ही गौबंश न जाए इसका उपाय ढूँढना होगा। स्वामी राघवेश्वर भारती देश भर में घूमकर यहीं कह रह हैं कि किसान के खूंटे से गाय न जाए इसका उपाय करना है। हमें समझना होगा कि आखिर उस किसान की क्या मज़बूरी है जो तिलक लगाकर अपनी गाय, अपने बैल को खूंटे से मुक्त कर देता हैं। अगर हम समझेंगे तो रास्ता निकलेगा । हम सोचें कि अगर किसान नहीं रख सकता तो गांव की ओर से उन्हें रखा जा सकता है? गांव भर की गोचर जमीन के लिए सब लोग इकटूठा हो सकते है क्या? उसी के लिए कुंछ एजेंडा बन सकता है क्या? जमीन के अधिकार की लडाई लड़ने वाले गोचर को जमीन की लडाई भी तो लड़ें । इस संबंध में हमने उनसे बात की थी । पिछले सत्रों में रमेश शर्मा जी ने अपनी बात रखी थी। जनादेश यात्रा में लगे लोगो से मैंने कहा था कि आप आदिवासियों की ओर से लड़ रहे हैं क्योकि उनको आवाज उठाने वाला कोई नहीं। इसी प्रकार आपको उनकी भी बात करनी चाहिए जो बेजुबान हैं। उन लोगों ने यह बात समझी है और अब गोचर जमीन के बारे में भी वे लोग सोच रहे हैं। तो जो जितना कर रहा है संवाद से उसे और बल मिलेगा : मैं फिर कह रहा हूँ कि हम संवाद करें, विवाद न करें। हम अपनी बात पर आग्रह रखे किन्तु दूसरे के मत का सम्मान भी तो करें। हम अपना आग्रह कई बार बहुत बढ़ा लेते है उससे बचें। हमें प्राय. लगने लगता है कि हम ज्यादा जानते हैं। अरे यह किसने तय किया? चार यार मिले और यह गलतफहमी पाल ली कि हम बहुत जानते हैं। वास्तविकता यह है कि हम जितना जानते है उससे बहुत अधिक नहीं जानते। 'अघजल गगरी छलकत जाए' वाली कहावत हमें भूलनी नहीं चाहिए। सबको साथ लेकर चलने में अपने को सत्याग्रही होने के साथ-साथ कईं पहलुओं के बारे में अनाग्रही भी होना पड़ता हैं। हमारे कहने के साथ-साथ सामने वाले का समझना ज्यादा ज़रूरी होता है। उनके समझने की चिंता बिना किए, केवल कह देना, ये तो अपने मन की भंडांस निकालने का एक तरीका ही हुआ। अक्सर लोग कहते है, हमने तो कह दिया। ऐसा कैसे भई। वो समझा कि नहीं समझा? ये भी ता देखों अगर ऐसा नहीं है तो फिर यह तो पीछा छुडाने वाली बात हुई। आप तो अंग्रेजी में जोर-जोर से बोले जा रहे है और उस बेचारे को अंग्रेजी आती ही नहीं हैं। अगर हमें लोगों से बात करनी है तो पहले हमें उनकी भाषा तो समझनी होगी । हममें से कई लोग कई बार ऐसी ही छोटी-छोटी बातों की भूल कर बैठते हैं। इसके कारण हम समझते है कि हम बहुत काम कर रह है जबकि हकीकत यह होती है कि हम बहुत लोगों को खो देते हैं। कई बार हम अपने को ज्यादा समझदार मानकर सरो को समझाने पर बहुत जोर देते हैं। हमारा बोलना जरूरी है क्या, यह सबाल हमें लगातार अपने से पूछना चाहिए। कोई जरूरी है कि, हम ही बोलें, जो लोग हमें सुनते है कभी उन्हें भी तो बोलने का मौका दें। हम ही बोलते रहें और वो सुनते रहे तो वे बोलना कब सीखेगें । वास्तव में बोलने की तुलना में सुनना-सीखना ज्यादा ज़रूरी हैं। क्योकि हम कईं बार 'Hear ' करते है, 'Listen ' नहीं करते। हम कई बार 'See' करते है 'Observe ' नहीं करते दोनों अलग -अलग बातें हैं। हम सुनाते रहते है पर बात पल्ले नहीं पड़ती और बात गुजर जाती हैं। बाद में अच्छा आपने ये कहा था क्या, ऐसा हम बोल पड़ते हैं। बैसे ही सामने वाला भी होता हैं। उसे मालूम है कि वह नहीं समझ रहा है, फिर भी मिथ्या अहंकार के कारण वह यह नहीं कह पाता कि वह नहीं समझ रहा हैं। मैं दुबारा कैसे पूंछूं, वो क्या समझेगा? अरे गोविन्दजी इतनी सी भी बात नहीं समझे। और मैं अनजान ही रह जाता हूँ। वर्षों-वर्षों रह जाता हूँ । केवल अपने इसी अहंकार के मारे। लोग क्या कहेंगे? इस लोग क्या कहेंगे के कारण बहुत दिक्कत में आदमी पड़ता है। खाने की इच्छा है रसगुल्ला, लेकिन मन में है कि लोग क्या कहेंगे। अटक जाता है । डायबिटीज़ न होने पर भी रसगुल्ला नहीं खा पाता है इस डर से कि लोग क्या कहेंगे। ध्यान रहे कि यह मैँ अपने लिए नही कह रहा हूँ क्योकि मुझे तो डायबिटीज है।

यह सही है कि मन और बुद्धि से इच्छा और विचार उपजते है, लेकिन वाणी और शरीर से कर्म भी तो होने चाहिए। हम कर्म में कई बार कम पड़ते है, इच्छा और विचार में ही पडे रहते है। अधिकांश बार इच्छा और विचार ज्यादा बड़े हो जाते हैं । जबकि कर्म में हम बोने रह जाते हैं । बदलाव आना है कर्म से, न कि केवल बचन, इच्छा और विचार से । इच्छा और विचार ही रहा तो हम राहु के समान हो जायेगें जिसके पास केवल सिर ही सिर होता है। वहीं अगर केवल कर्म रहा तो हम केतु बन जाएंगे जिसके पास केवल धड़ होता है। इसलिए न हम राहु बनें, न कंतु बने। क्रिया और ज्ञान दोनों को मिलाकर ही तो शक्ति होगी। ज्ञान रहित क्रिया निरंकुश होती है और क्रिया रहित ज्ञान अपंग होता है। आज की ज़रूरत ज्यादा से ज्यादा काम करने की है। भाषण नहीं सुझाव नहीं। भारत को आज कर्म से पका हुआ अनुभव चाहिए। इसलिए इस बार के संपूर्ण सत्र में आपने गौर किया होगा कि सुझाव की बात बहुत कम थी। अनुभव की बातें बहुत ज्यादा थीं। लोगों के भाषण में और बातचीत में यहीं बात सुनाईं दे रही थी कि हमने ये किया, हमने ये पाया, और हमारा ये अनुभव है। आगे हमारी यही साधना पद्धति होगी। हमें नहीं आता, हमने नहीं किया है देखो फंला को मालूम है, हमारे अंदर यह कहने की ताकत तो होनी चाहिए। जल की बातें है, खेती की बातें है, गौ की बातें है, ऐसी और कई बाते है जो मुझे बहुत नहीं मालूम इनके बारे में कोई पूछता है तो मैं कह देता हूँ कि यार हमको नहीं मालूम, उसको मालूम है। कोई खेती की बात करता है ता मैं कहता हू कि एक बार सुरभि शोध संस्थान जाओ वहां बहुत जानकार लोग हैं। हमको कहाँ मिट्टी को बात मालूम है। अरे पी एच डी की बात तो हम सुने भर हैं। लेकिन राघेशंकर तिवारी तो मिट्ट्टी देख के गाँव की पूरी कुंडली बता देते हैं। वे मेड़ वगैरह की स्थितियों को देखकर गाँव की स्थिति बता देते हैं कि इस गांव में कातिल है, इस गाव में बहुत मुकदमेबाजी है, इस गॉव के लोग सुख-शांति से कुछ उपजाते है। वो मेड़ देख के सब बता देते हैं। अब उनके पास भेजने की बजाए मैं किसी को मिट्ट्टी के बारे में बताने लगूँ तो यह तो उसके साथ अन्याय ही होगा।

हमें दूसरों की प्रतिभा और योग्यता के बारे में पहचानने और उसे बताने को बात सीखनी होगी। अपनी कार्यशैली में इसे अधिक से अधिक अपनाने की जरूरत है। इसलिए मैं कहता हूँ कि हमें 'भारत विकास संगम' के नाते से एक और संगठन नहीं बनना है। हमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष के चक्कर में नहीं पड़ना। किसी को अध्यक्ष बनाया तो दूसरा कहेगा कि मुझे क्यों नहीं। कई बार दूसरों से अच्छा अध्यक्ष बनने की कोशिश में अन्य संगठनों में जो होता है वहीं यहां भी शुरु हो जाएगा। जाति छोड़ने के नाम पर जिन लोगों ने संगठन बनाया, अंतत: उन्होंने एक और ही जाति बना ली। उससे क्या फायदा हुआ। बेहतर है कि सबको जोड़ा जाए लेकिन संगठन की बेडी पहनाए बिना। इसलिए मैने संगम की बात की एसे ही अगली बर जब मिले तो कुंभ की बात हो। आज यहां सत्रों की रचना करते समय हमारे बहुत से साथी परेशान-परेशान थे। वो क्या है कि वे यहाँ की कुल संख्या गिनेंगे और बाहर कितने है ये गिनेंगे । मैने कहा, अरे ये छोडो यारो कुंभ मेला में कौन गिनता है कि कितने आए कितने गए। लोग अपनी गठरी-मोटरों बांधे आते है और चले जाते है। सूर्य कान्त जालान कह रहे थे कि गोविन्द जी अज़ीब बात है, गाड़ी से हम इतने सारे लोगों को स्टेशन भेज चुके है, लेकिन स्थापन समारोह में अभी भी इतने लोग बैठे हैं। संचालन में लगे हमारे सुरेन्द्र जी हमको बहुत कहते थे कि बताओ कितने का परिचय कराना है, कब कराना है, मंच पर कौन बैठेंगे, कौन चलाएंगे। मैं कहता कि हा भाई चलिए हो जाएगा। तो ये जो अराजकता सी दिखती है, ये वास्तव मे अराजकता सी नहीं। इस अराजकता में प्रेरणा की समानता है स्थितियों की विभिन्नता है यहाँ की ज़रूरतें कुछ अलग-अलग हैं। इसलिए जो नहीं आए वो आलसी है, ये कहना गलत है । अमुक कार्यकर्ता के पत्नी को अस्पताल में दाखिल करना पड़ा, इसलिए नहीं आया। अमुक कार्यकर्ता के घर गमी हो गई, इसलिए नहीं आया। तो नहीं आया, इससे ही निष्कर्ष निकाल लेना उसके प्रति अन्याय होगा और हमारी अपनी भूल होगी। इसलिए प्रेरणा की समानता को और हम ज्यादा ध्यान दें। खैर, ये सब बाते हो गई बहुत । और ये सब अगर करना है भईया तो हमको खुद को बडा बनाना है। और खुद को बड़ा बनाना है तो स्वाभाविक है लोभ, भय ,मोह कम करना, हो सके तो छोड़ देना । अगर ऐसा हम करते हैं तो कुछ वर्षों के बाद हम पाते है कि अपने जीवन में जहाँ गुण कुछ बढे है, वहीं दोष कुछ घटे हैं। हम कोशिश करे कि गुणों का उपयोग बढे और दोषों की छाया घटती जाए। यहा हनुमान जी का उदाहरण देना प्रासंगिक होगा। उसके पास बहुत क्षमता, बहुत ताकत थी लेकिन बे तब तक नहीं बड़े बने, जब तक उन्होंने किसी के काम से अपने को जुड़ा हुआ नहीं पाया। जामबंत जी न जब उन्हें कहा कि राम काज के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है तो यह सुनते ही उन्हें अपने बड़ेपन का एहसास हुआ। तात्पर्य यह है कि यदि हम छोटी-छोटी बातों के बारे में तो बडे नहीं बन पाएंगे। बड़े लक्ष्य के साथ अपने का जोड़कर ही हम बड़ा बन पाएगें ।

जनहित का कोई भी काम बडा काम होता है वह भगवान का काम होता है। यदि हम उसे करने का संकल्प करेंगे तो भगवान खुद हमें बल देंगें साथ ही हमें भारत माता ,गौ माता और अपनी घर की माता, सभी का आशीर्वाद प्राप्त होगा । इसी विश्वास के साथ मैं अपनी बात पूरी करता हूं।क आस्था कम होती जा रहीं है।