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सज्जन-शक्ति समन्वय


सज्जन-शक्ति समन्वय

भारत के उज्जवल भविष्य को सबसे बड़ी गारंटी यहाँ की सज्जन शक्ति है। यह शक्ति आज जिस मनोयोग से भारत के पु-निर्माण में लगी है,उससे यह आशा बंधती है कि हम भारत को फिर से सोने की चिडिया बना सकंगे। अध्ययन अवकाश के दौरान और उसके बाद विभिन्न स्तरों के लोगों से मिलते हुए मुझे देश में सब स्थानों एवं स्तरों पर एक नय आत्मविश्वास , एक नयी स्फूर्ति का स्पष्ट आभास हुआ। सब स्थानों पर सब स्तरों के लोग विभिन्न माध्यमों को अपने सामर्थ , अपने कोशल एवं अपनी क्षमताओं का परिचय दे रहे हैं। सार्वजनिक हित्य के अनेक नित्सबार्थ कार्य में लोग नये उत्साह एवं मनोयोग के साथ लगे दिखते हैं। अनेक लोग जलसंरक्षग्ना के कार्यों में लगे हैं। लुप्त हुए नदी , नाला एबं तालाबों को पुनर्जीवित कर रहे हैं। अनेक देशी खेती के छोटे-बड़े प्रकल्पों के माध्यम से भूमि की सहज उर्वरता लौटा लाने का प्रयास ककर रहें हैं' अनेक विभिन्न स्तरों पर पाठशालायें चला कर साधारण बच्चों के प्रशिछित करने में जुटे हैं! पुराने मंदिरो एल संस्थानों का जीर्णोद्धार करवा रहे है इनके माध्यम है सामुदायिक संप्रभुता एल सक्रियता के पुरातन भारतीय भाव को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं। अनेक अन्य लेगा ऐसे विभिन्न प्रकार के सार्वजनिक कार्यों में निःस्वार्थ भाव से लगे हैं। उन्हें प्रकार के प्रचार या सरकारी प्रोत्साहन को कोई जरूरत नहीं है। उनका प्रयास ममाज का प्रयास है। उसे समाज से ही ऊर्जा मिलती है। इन सार्वजानिक कार्यों एवं संकल्पो में से कुछ तो अत्यंत बड़े स्तर पर चल रहे हैं' मैंने स्वैच्छिक प्रयासों से बनायी गयी एव चलायी जा रही गोशालाओं , एक बृहद तंत्र देखा है। इसी प्रकार जल संरक्षणा एवं देशी खेती से सबंधित कुछ अत्यंत जहं प्रकल्प चल रहे हैं। अन्य अनेक प्रकल्प अपेक्षाकृत छोटे है और प्राय: किन्हें एक-दो ग्राम समुदायों तक ही सीमित हैं। लेकिन अच्छी बात यह है कि इन छोटे-छोटे प्रकल्पों की बहुतायत है । देश के कोने-कोने में हजारों की संख्या मेँ फैले यै प्रकल्प यह दर्शाते हैं कि भारत की सज्जन शक्ति में देश को खुशहाल बनाने के लिए कितनी बेचैनी है।

सज्जनशक्ति की सक्रियता केवल रचनात्मक कार्यों में ही नहीं बल्कि बौद्धिक एवं अल्दीलनात्मक गतिविधियों में भी दिखाई देती है। परंपरागत निधियों के मरक्षण-मवर्धन एव भारतीय जीवन को सकारात्मक बल देने के लिए बहुडिध शोध एव अध्ययन किए जा रहे हैं। राजसत्ता को जनाभिमुख बनाने के लिए भी प्रयास हो रहा है। कुछ लोग सूचना के अधिकार का प्रयोग करते हुए सरकारी तंत्र को अनुशासित एव उत्तरदायी बनाने की कोशिश कर रहे है, जबकि कुछ लोग जनजागरण के द्वारा सरकार को जनविरोधी नीतियों का विरोध करने में लगे हुए हैं। इन सब गतिविधियों से अब यह स्पष्ट हो गया है कि भारत के लोग अपनी किसी स्वयंस्कूर्त दिशा में चल निकले हैं। अपने नि: स्वार्थ सार्वजानिक कार्यों के माध्यम से वे राष्टीय पुननिर्माण में जुटे दिखते हैं। उनके प्रयासों से समुदाय सशक्त हो रहै है और साघारन लोगों में आत्मविश्वास लौट रहा है। सक्रिय सज्जनशक्ति के बिना राष्टीय पुननिर्माण के इस स्वरूप की कल्पना नहीं की जा सकती थी।