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व्यवस्था परिवर्तन

राज्य की नीतियों की प्रकृति इस बात से तय होती है कि राजसत्ता में बैठे लोग कैसा समाज चाहते हैं। इन नीतियों का परिणाम एक पैकेज के रूप में प्राप्त होता है। हम उन्मुक्त उपभोग को यदि विकास का लक्ष्य मानेंगे तो इसके लिए अनुकूल व्यवस्थाएं और नीतिया बनेगी। उन्मुक्त उपभोगयुवत्त समाज मैं गैरबराबरी, बेरोजगारी, हिसा टकराव, प्रदूषच्चा, नई -नईं बीमारिया, पर्यावरण विनाश और शोषण आदि की फलने-फूलने का भरपूर मौका मिलेगा। भारत इसका ज्वलंत उदाहरण है।

भारत की आज की अधिकतर स्थापित व्यवस्थाएं औपनिवेशिक काल में गढ़ी गई थीं। यहां के सार्वजनिक जीवन में यहां के अपने लोगों की भागीदारी को परिसीमित करना है भारत के लोगों और उनकी परम्पराओं, उनकी क्षमताओं एवं उनकी इच्छा-अनिच्छा को भारत के सार्वजनिक जीवन से बहिष्कृत करने के प्रबन्ध करना ही इन विदेशी व्यवस्थाओं के निर्माण का प्रमुख ध्येय था। राजनीतिक स्वतंत्रता की प्राप्ति के पश्चात भी ये व्यवस्थाएं अपने उसी मूल सिद्धांत के आधार पर काम कर रहीं है।

भारतीय परंपरा में राजसत्ता और अर्थसत्ता कभी भी सर्वोपरि नहीं रही। यहां हमेशा इन्हें समाजसत्ता एबं धर्मसत्ता द्वारा मर्यादित किया गया है। वर्तमान समय में स्थिति उलट गई है। आज राजसत्ता और अर्थसत्ता में गठजोड़ हो गया है और वे मिलकर समाजसत्ता और धर्मसत्ता को नियंत्रित करने में लगी हैं। एक ऐसे समाज की रचना की जा रही है जिसमें पूंजी ही ब्रह्म है, जैसै- तैसे मुनाफा कमाना ही मूल्य है और उन्मुक्त उपभोग ही मोक्ष है। व्यक्ति , परिवार, गांव, इलाका, देश-ममड आदि इकाईयों के साथ व्यक्ति के मानस और सोच को संश्लेषित करने की बजाय व्यक्ति क्रो एकाकी समझकर और राज्य को ही संचालन विधि का सर्वस्व मानकर नीतियां बनाई जा रही है।

केन्द्रीयकरण, समरूपोकरण एबं बाजारीकरण की प्रवृति वाली वर्तमान व्यवस्था न केवल भारत बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए अमंगलकारी है। यह संपूर्ण संक्रिया न केवल प्रकृति विरोधी बल्कि मानव विरोधी भी है।यदि हम मानव सभ्यता को चिरंजीवी बनाना चाहते है तो हमें एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करनी होगी जो विकेन्द्रीयकरण, बाजारमुक्ति, विविधीकरण मूल स्थानिकीण के सिद्धातों पर चले, जहां राज़सत्ता और अर्थसत्ता को सर्वोच्च नहीं बल्कि समाज़सत्ता का पूरक माना जाए और जहां उन्मुक्त उपभोग को नहीं बल्कि सीमित उपभोग एवं यथोचित वितरण पर जोर दिया जाए।

राजनैतिक सत्ता में परिवर्तन के माध्यम से स्थापित व्यवस्थाओं में परिवर्तन के कई प्रयास किए जा चुके हैं। लेकिन, ऐसे सारे प्रयास असफल ही सिद्ध हुए हैं । अब इस बात पर सहमति है कि अनुकूल राजसत्ता व्यवस्था परिवर्तन के लक्ष्य में सहायक तो हो सकती है, लेकिन पर्याप्त नहीं। इसलिए व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई को राजनैतिक या आधिक स्तर पर ही नहीं बल्कि जीवन लक्ष्य, जीवनादर्श, जीवनमूल्य और जीवनशैली की समेकित परंपरा के स्तर यर भी लड़ना होगा। यदि हम व्यवहारिक स्तर पर देखे तो भारत में व्यवस्था परिवर्तन की इस लडाई के तीन आयाम है। पहला है बौद्धिक आयाम । पिछले 500- 1000 वषों और विशेष तौर पर पिछले 250 वर्षों में इकट्ठा हुआ कुछ कूड़ा-कचरा और कुछ गर्द-गुबार भारतीय ममाज की संचालन व्यवस्था को कुंठित कर रहे है। जीवनशैली, जीवनमूल्य के स्तर पर भी बहुत कुछ चाहे -अनचाहे वाशित-अवाशित हमारे भीतर समा गया है। विगत वर्षों में जितना कुछ भी अच्छा और बुरा बदलाव समाज में हुआ है, उसे दूर कर अतीत के भारत की ओर लौटना न संभव है, न वांछनीय है इसलिए क्रमशः उपयोगी-निरूपयोगी त्तत्वों के मानक बनाकर, हुए बदलाव को स्वीकारने और नकारने की स्थितियां निर्मित करनी होंगी। हमें स्वदेशी को चुगानुभूल और जरूरत पडे तो विदेशी को देशानुकुल करने के लिए तैयार रहना चाहिए । इस संदर्भ में कई तरह के शोधकार्य आवश्यक होंगे। भारत को जानने, समझने का जो यूरोपीय और खासकर अंग्रेजी नजरिया हमारे ऊपर हावी है, उससे हमें मुक्त होना होगा। भारत के लिए उपयुक्त व्यवस्था वह होगी जो भारतीय नजरिए और भारतीय परिस्थितियों की सही समझ पर आधारित होगी।

व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का दूसरा आयाम है रचनात्मका। हम जिस व्यवस्था को स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहै है, उसका बुनियादी त्तत्व है समाज़सत्ता की प्रधानता। यह प्रधानता राज़सत्ता की बैसाखी से नहीं बल्कि समाज को अपने दम पर हासिल करनी होगी। समाज को यह साबित करना होगा कि वह अपनी व्यवस्थाएं चलाने में राजसत्ता पर पूरी तरह से निर्भर नहीं है। इस लक्ष्य क्रो हासिल करने के लिए एक ओर जहां कम पूंजी है कम लागत के प्रकल्पों को बढ़ावा देना होगा, वहीं जीवनशैली और जीवन मूल्यों के स्तर पर भी लोगों को जागृत करना होगा। 'हमें लोगों को यह बताना होगा कि संयम की संस्कृति से ही समाज में आत्मीयता, समरसता और समृद्धि का विस्तार होगा। परिवार संस्था और समाज में पारस्परिकता की भावना से ही सर्वजन सुखी हो सकता हैं । उसके लिए अनैतिक जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठा देनी ही होगी। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ये सब बातें केवल किताबी होकर न रह जाएं। हमें अपने बीच विविध रचनात्मक कार्यों की फलीभूत होते दिखाना पडेगा। आम आदमी हमारी बात्तों पर तभी भरोसा करेगा जब उसे यह सब कहीं घटित होते हुए दिखाई देगा ।

व्यवस्था परिवर्तन की दृष्टि से तीसरा आयाम है आंदोलनात्मक बौद्धिक हलचलों और रचनात्मक प्रकल्पों के साथ -साथ आदोलनात्मक गतिविधिया भी अत्यंत ज़रूरी हैं। आज के संदर्भ में राजसत्ता की तारक शक्ति कम, मारक शक्ति अधिक है। यदि उसका आदोलनात्मक गतिविधियों से नियमन न किया गया, उस पर अंकुश नहीं लगाया गया तो वह बडी आसानी से बौद्धिक एव रचनात्मक प्रयासों को हानि पहुंचा सकती है। सत्ता और दलों की परिधि से बाहर रहते हुए जनआंदोलन, जनसंघर्ष और जनदबाव के जरिए ही सत्ता की राजनीति को मूल्यों और मुदूदों की पटरी पर लाया जा सकता है। मेरा मानना है कि अब दलीय राजनीति से परे एक समानांत्तर राजनैतिक आदोलन शुरु करने की जरूरत है, एक ऐसा आंदोलन जो पूरी तरह से अहिंसक हो। कोई भी हिंसक आंदोलन समाज में सकारात्मक परिवर्तन नहीं कर सकता। मैं जिस आंदोलन की बात कर रहा हूँ उसका उदाहरण 1936 के पहले की काग्रेस में देखा जा सकता है।

1947 से पहले आज़ादी की लडाई की एक खास पहल भी दिखाई देती है। उस दौर के नायक और स्वतंत्रता सेनानी अग्रेजों के खिलाफ तो जंग लड़ ही रहे थे लेकिन साथ ही वे 500 सालों की गुलामी की जकड़न से उपजी समाजिक व्यवस्था की ख़ामियो से भी संघर्ष कर रहे थे। साम्राज्यबादी और आर्थिक साम्राज्यबादी नीतियों का विरोध तो था ही साथ ही सामाजिक कुंरीत्तिया कैसे खत्म हों, इस पर भी स्वतंत्रता सेनानियों ने खासा बल दिया। आजादी के बाद 70 के दशक में राजनीतिक क्राति का सूत्रपात हुआ। इसके प्रमुख नायक जयप्रकाश नारायण थे। 1980 से भारतीय राजनीति में धनबल ओर बाहुबल जैसी वृत्तिया अपनी पेठ बनाने लगीं। इसके बाद पिछले कुछ वर्षो से छोटे-बड़े तमाम आंदोलन हुए। ये आदोलन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को मनमोहन सिह की अगुवाई वाली सरकार के दोनों कार्यकाल में चली नीतियों के खिलाफ थे। इनमें भ्रष्टाचार, खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेष, जन लोकपाल जैसे मुद्दे देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचे । इन आंदोलनों का प्रभाव यह हुआ कि इसने देश के जनमानस को एक बार फिर से जगा दिया। लेकिन इन आंदोलनों की ऊर्जा किस रूप में व्यवस्था परिवर्तन में सहायक हो इसे लेकर जनमानस द्वन्द में है। क्योकि इनके सामने कोई राजनीतिक विकल्प नहीं है। हालांकि, विकल्पों की कवायद शुरू है। देश भर में जितने भी छोटी- बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ और संगठन बदलाव के मकसद से काम कर रहे हैं, उन सभी को एक मंच पर लाने की कोशिश चल रहीं है। संभावना है कि यह मूर्त रूप लेगा। क्योंकि यही ममय की मांग है।

कईं बार समय ऐसा आता है कि कूछ बुनियादी बदलाव के साथ नए रास्ते तलाशने ही पड़ते हैं। आजमाए हुए और अपनाए गए रास्ते से पूरा काम नहीं होता। अभी जो हालात पैदा हो रहै है उसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभ्यताओं के संघर्ष बढ़ने का संकेत साफ तौर पर मिल रहा है । इसे सभ्यताओं के स्तर यर अलग-अलग आका जाना चाहिए और इससे निपटने की दिशा में सोचा जाना चाहिए। इस संदर्भ में जब भारत के सत्ता प्रतिष्ठान के रवैये यर निगाह डाला जाए तो यह साफ तौर पर पता चलता है कि वह समस्याओ को पहचानने और समझने में अक्षम दिख रहा है। ऐसे में रास्ता ढूढ़ने की बात तो बहुत दूर है।

अभी की संसदीय राजनीति वोट की सियासत में इस तरह उलझ गई है कि इससे साहसपूर्ण ढंरा से समस्याओ क्रो भेदने की अपेक्षा नहीं हैं। आतंकवाद जैसे मसले को देखते हुए साफ है कि खतरा बढ़ता गया और नए रास्ते तलाशने का साहस घटता गया । अभी जाति और क्षेत्र के आधार पर देशतोड़ कर राजनीति हो रही हैं। काग्रेस और बाकी के लोगों द्वारा एटीएस का दुरुपयोग भी देशतोड़क राजनीति ही है। वोट से नोट और नोट से वोट और छद्दम राष्ट्रवाद भी राजनीति का अहम हिस्सा बन चुका है। सभी दल दोहरेपन के शिकार है। सभी अपनी जिम्मेदारियों की अनदेखी करते हुए सस्ती और छिछली राजनीति में ही उलझे हुए है।

मौजूदा हालातों को देखते हुए यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि सत्ता की परिणाम देने की क्षमता बेहद कम हो गई है। अपने ही स्वार्थ साधने में सत्ताधीश इस कदर मगन है कि आम जन की आकाक्षाअॉ के अनुरूप वे काम नहीं कर पा रहे है | इसलिए अपेक्षाके अनुरुप परिणति भी नहीं आ या रहे है। इसके उलट सत्ता को मारक क्षमता बढ़ गई है। अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को बंद करने के नए-नए रास्ते सत्ता ने तलाश लिए है। इसकी वजह से लोकतात्रिक आस्था कम होती जा रहीं है।

यह बात अच्छी तरह से जान लेना होगा कि घर्मसत्ता और समाजसत्ता की पूरक राजसत्ता हैं। पर अगर राजसत्ता ही सर्वोपरी बन जाए तो समस्याओ का गहराना निश्चित है। दुर्भाग्य से ऐसा हो गया है जिसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है। सही मायने में कहा जाए तो सत्ता राजनीति का मूल स्थान नहीं है बल्कि एक अंग मात्र है। अभी सत्ता को ही राजनीति का मूल स्थान मान लिया गया है। इस वजह से किसी भी रास्ते को अस्तियार करके सत्ता में बने रहने और उस तक पहुंचने को होड़ काफी बढ़ गई है । इस प्रवृति ने लोगों क्रो मतदाताओं में बदल कर छोड दिया है। सत्ता को ही अपना लक्ष्य मानने वाले आम जन को बस वोट पाने का जरिया मात्र मानकर उनके हितैषी होने का ढोंग रच रहे है ।

कईं बार समय ऐसा आता है कि कूछ बुनियादी बदलाव के साथ नए रास्ते तलाशने ही पड़ते हैं। आजमाए हुए और अपनाए गए रास्ते से पूरा काम नहीं होता। अभी जो हालात पैदा हो रहै है उसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभ्यताओं के संघर्ष बढ़ने का संकेत साफ तौर पर मिल रहा है । इसे सभ्यताओं के स्तर यर अलग-अलग आका जाना चाहिए और इससे निपटने की दिशा में सोचा जाना चाहिए। इस संदर्भ में जब भारत के सत्ता प्रतिष्ठान के रवैये यर निगाह डाला जाए तो यह साफ तौर पर पता चलता है कि वह समस्याओ को पहचानने और समझने में अक्षम दिख रहा है। ऐसे में रास्ता ढूढ़ने की बात तो बहुत दूर है।

अभी की संसदीय राजनीति वोट की सियासत में इस तरह उलझ गई है कि इससे साहसपूर्ण ढंरा से समस्याओ क्रो भेदने की अपेक्षा नहीं हैं। आतंकवाद जैसे मसले को देखते हुए साफ है कि खतरा बढ़ता गया और नए रास्ते तलाशने का साहस घटता गया । अभी जाति और क्षेत्र के आधार पर देशतोड़ कर राजनीति हो रही हैं। काग्रेस और बाकी के लोगों द्वारा एटीएस का दुरुपयोग भी देशतोड़क राजनीति ही है। वोट से नोट और नोट से वोट और छद्दम राष्ट्रवाद भी राजनीति का अहम हिस्सा बन चुका है। सभी दल दोहरेपन के शिकार है। सभी अपनी जिम्मेदारियों की अनदेखी करते हुए सस्ती और छिछली राजनीति में ही उलझे हुए है। ॰

मौजूदा हालातों को देखते हुए यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि सत्ता की परिणाम देने की क्षमता बेहद कम हो गई है। अपने ही स्वार्थ साधने में सत्ताधीश इस कदर मगन है कि आम जन की आकाक्षाअॉ के अनुरूप वे काम नहीं कर पा रहे है | इसलिए अपेक्षाके अनुरुप परिणति भी नहीं आ या रहे है। इसके उलट सत्ता को मारक क्षमता बढ़ गई है। अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को बंद करने के नए-नए रास्ते सत्ता ने तलाश लिए है। इसकी वजह से लोकतात्रिक आस्था कम होती जा रहीं है।

यह बात अच्छी तरह से जान लेना होगा कि घर्मसत्ता और समाजसत्ता की पूरक राजसत्ता हैं। पर अगर राजसत्ता ही सर्वोपरी बन जाए तो समस्याओ का गहराना निश्चित है। दुर्भाग्य से ऐसा हो गया है जिसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है। सही मायने में कहा जाए तो सत्ता राजनीति का मूल स्थान नहीं है बल्कि एक अंग मात्र है। अभी सत्ता को ही राजनीति का मूल स्थान मान लिया गया है। इस वजह से किसी भी रास्ते को अस्तियार करके सत्ता में बने रहने और उस तक पहुंचने को होड़ काफी बढ़ गई है । इस प्रवृति ने लोगों क्रो मतदाताओं में बदल कर छोड दिया है। सत्ता को ही अपना लक्ष्य मानने वाले आम जन को बस वोट पाने का जरिया मात्र मानकर उनके हितैषी होने का ढोंग रच रहे है।

अब तक का अनुभव यह बताता है कि आमजन से जुडे मसलों पर संगठनों बने बाहर से ही आवाज उठती रही है। वह चाहे जिन्न के महिमामडन का मामला हो रामसेतू के टूटने का मसला हो या फिर आतंकवाद हो इन सब पर संगठनों के बाहर से ही आवाज उठी है। इसमें संगठन के लोगो में साहस के साथ बुनियादी बहस छेड़ने की बजाए पीछा छुडाने की क़वायद ही दिख रही है । इसके बावजूद मौजूदा राजसत्ता से ही काम चलाने की आसं लगाए रहना समझदारी नहीं हैं।

अगर बहुसंख्यक समाज भी हथियार उठाने लगे तो फिर देश अभी के सत्ता प्रतिष्ठान से संभाले नहीं संभलेगा। 2008 में कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी से कई गंभीर सवाल उभरे। जिनकी अनदेखी ठीक नहीं है। चिंता की बात यह भी कि सेना में भी ऐसा सोचने बाले लोग क्यों हो गए? इसका मतलब कहीँ बहुत कुछ गलत हो रहा है। कहीं बहुत सी न्यायोचित बातें अनसुनी की जा रही हैं। इस आवाज को सुना और इससे उभरे क्रोध को गंभीरता से समझा जाना चाहिए। समाज के अदर चल रहे "उथल-पुथल और आवेगों को समझा नहीं गया तो समस्या बिलकूल विरुद्ध हो जाएगी।

राष्टीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर रहते हुए एम. के. नारायणन ने कहा था कि सिमी और अयन मुजाहिदीन जैसे संगठनों को एक तरफ रखकर देखना चाहिए और बजरंग दल की छिटपुट उकसाऊ भाषाई और गतिविधियां को इससे अलग करके देखा जाना चाहिए। हर तरह से पोषित आतंकवाद संगठन की गतिविधियां अलग तरह की होंगी और भावना व आवगे जनित कुछ गतिविधिया अलग प्रकार की होंगी। इसमे अंतर को बेहतर ढ़ग से समझने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुचा जाना चाहिए; इसके अलावा अभी पोटा पर निरर्थक बहस चलाई जा रही है। काग्रेस कह रही है कि पोटा से भी कड़ा कानून लाया जाए। इस संदर्भ में हमें यह याद रखना होगा कि पोटा के रहते ही संसद पर हमला हुआ था । उस वक्त क्या कर लिया गया? हमें यह समझना होगा कि सिर्फ कानून बना देने भर से कुछ भी नहीं होगा। यहा सवाल नीयत और इच्छाशक्ति का है। सच्चाई तो यह है कि पोटा से ज्यादा कड़ा कानून लाने की कोशिश कांग्रेस इसलिए कर रहीं है कि उसकी आदत आपातकाल लगाने की है। कांग्रेसी और उनकी तरह सोचने वाले लोग इसका इस्तेमाल आतंकवादियों के बजाए राजनीतिक विरोधियों पर ही करेंगे। कांग्रेस सत्ताकाक्षी गैर जिम्मेदराना राजनीति करती रही है और यही प्रवृति कमोवेश सभी राजनीतिक दलों में आ गई है। यह इस वक्त की बहुत बडी समस्या है। इससे देश की एकता, अखंडता, समरसता और सदभाव समेत लोकतंत्र पर भी खतरा है। यह भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि इस प्रवृति से देश पर विखंडन का खतरा बढ़ते जा रहा है।

आर्थिक मंदी के मसले पर भी सत्ता प्रतिष्टानों का गैंरजिम्मेदाराना रवैया देखा जा सकता है। मंदी को लेकर देश में भ्रम बनाने का काम इस सरकार ने बहुत अच्छी तरह किया। सत्तासीन सरकार के अलावा विपक्ष भी इस मुहे को जनता के सामने सही तरह से रख पाने में असफल रही। जिस पूंजीवाद के भरोसे पूंजीबाद को विकसित होने का खवाब दिखाने का काम पक्ष और विपक्ष करते रहे है उसका हश्र आर्थिक मंदी के साथ पूरी दुनिया ने देख लिया है। इससे यह बात भी साफ है कि अमेरिका परस्त नीतिया हमें भयानक संकट की और ले जा रहीं है। इससे देश और समाज को होने वाले नुकसान के प्रति यह सियासी दलों का उदासीन रवैया देख कर ऐसा लगता है कि ये अपने स्वार्थ सधते रहने के कारण राष्ट्रहित की उपेक्षा कर रहे हैं। मंदी की मार से ज्यादा खतरनाक तो मौजूदा व्यवस्था का अमेरिकापरस्त और विदेशपरस्त रवैया है।

जब हर तरफ जन विरोधी, समाज विरोधी और राष्ट्र विरोधी माहौल दिख रहा है तो ऐसी स्थिति में जिन पर दारोमदार माना जाता है उन्हें संगठन .के दायरे से बाहर निकल कर जन के दायरे में सोचना होगा। संगठन का तकाजा यह है कि समाज संगठनों की एकता को संरक्षित देखना चाहता है। संगठन के पले-बढे. लोग ये समझते है कि एक ही विचार के संगठनो का अलग-अलग बंटा होना समाज की पसंद नहीं हैं। ये लोग यह भूल जाते है कि अगर कोई साहसिकता के साथ संगठनों के दायरे रने बाहर जाकर पहल करते है तो समाज उसे पसंद करता हैं। जनता को ये लगता है कि जब वैधानिक राज्य आतंकवाद से निपटने में असफल हो तो और क्या किया जाए। वैधानिक राज्य जब जनता को संरक्षण देने में असफ़ल साबित होती है और वह अपने खातिर कोई कदम उठाती है तो इसमें गलत क्या हैं। इसे आत्मरक्षा का प्रयोग मानना होगा आक्रमण का प्रयोग नहीं। इसलिए आक्रमण और आत्मरक्षा की बात के भेद को समझा जाना चाहिए।

इन सारी चीजों को देखने के बाद यह बिल्कुल साफ़ है कि समाज की मांग और संगठनों के मुद्दे बे मेल होते जा रहे हैं। जिनसे आशा श्री वे भी परखे जा चुर्क है और बे भी अलग साबित नहीं हुए। 1998 के पहले एक आशा जगती थी कि राष्ट्रवादी विचार के लोग सत्ता में आएंगे तो " सकारात्मक बदलाव करेंगे। पर ऐसे लोग जब सत्ता में आए तो उलटा ही हुआ। उन्हें जो काम करने भेजा गया था, बो तो किया नहीं बल्कि कुछ और कम में ही फस गए । भाजपा को लोगों ने सता में मंदिर बनाने भेजा था लेकिन वह वहा जाकर सड़क बनाने में ही लगी रही। भाजपा के लोग यह भूल ही गए कि लोगों से उन्होंने यह वायदे किए थे। आतंकबादियों से निपटने की बात तो दूर आतंकबादियों को और कंधार में सुरक्षित छोड़ आए। जब सबसे ज्यादा विश्व जनमत साथ को संसद पर हमला हुआ।

इसके प्रतिकार स्वरूप भी भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार कुछ भी नहीं कर पाई। घुसपैठ के खिलाफ़ कानून बनाने की बात अधूरा ही रह गई। एनडीए के राज में आतंकवाद में आईएसआई की भूमिका पर श्वेत पत्र प्रकाशित होना था लेकिन नहीं हुआ। विदेशी मूल के मुद्दे पर कानून बनाकर ढक्कन लगाने की बात हुई थी। उसके जगह विदेशी मूल के मुद्दे कां एक्ट लाकर पिछली सरकार ने ही खारिज कर दिया। इसके परिणामस्वरूप विदेशी मूल को सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनने के काफी करीब पहुच गई पर उस समय राष्टीय स्वाभिमान अन्दोलन कं हस्तक्षेप से देश शर्मसार होते-हीते बचा। भाजपा सत्ता में आने से पहले गोहत्या बंदी की बात करती थी लेकिन उसके राज में मांस निर्यात तेजी से बढा। गरीबी, बेरोजगारी और गैरबराबरी के मोर्च पर तो पिछली सरकार विफल रही ही। इन सारे मोर्चों पर असफलता का सेहरा अपने सर बंघवाने के बावजूद अब भी भाजपा चुनाव के वक्त टोकरी लेकर वोट की भीख मांगने में जरा भी सकोच नहीं कर रही है।

देश ने हर दल को आजमा कर देख लिया। सबने यह जान लिया है कि दलों का फर्क मिट चुका है। वैधानिक मशीनरी की असफलत्ता से समाज में भय और निराशा फैल रहा है। राष्ट्रवादी विचार के लोग इन स्थितियों से वाकिफ होने के बावजूद बदलाव के लिए हिम्मत नहीं जुटा पा रहै हैं। ऐसे लोग चाहते है कि रास्ता निकले। पर उन्हें ये नहीं मालूम कि तरीका क्या हो ? आज जहा नए तरीके को अपनाने की जरूरत है वहा यहीं आजमाए गए तरीके का इस्तेमाल की कोशिश ठीक नहीं है। सही मायने में यह देश के प्रति और मौजूदा समस्याओ के प्रति न्याय नहीं होगा। हम अपने को इस मुगालते में रखे हुए है कि हमने कूछ कर दिया और इसी से सुकून पा रहे है। इस आत्ममुगद से हम खुद की ही तो छल रहै हैं।

लड़ाकै तैयार करने ही होगे। आगे जिस नए राजनीतिक रास्ते को जरूरत है, उसके बगैर काम नहीं चलेगा। अभी तक के परखे, दागे और चुके हुए कारतूसों के आधार पर आगे की चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता है। इसलिए प्रखर राष्ट्रवादी भाव के साथ स्वार्थ और प्रचलित दायरों से बाहर रहकर सोचने, समझने, सीखने और करने की आदत डालनी होगी। तभी देश में राष्ट्रवादी जनाधार को बल मिल पाएगा। ऐसा नहीं करने पर जिम्मेदार लोग भी कर्तव्यच्युत मने जाएंगे। बाजारवाद ने आम आदमी को रोज़ मर्रा के काम में ही उलझा देने की साजिश के अमली रूप दिया है। बाजारवाद ने लोगों ने इस तरह से लोगों को रोज़ मर्रा मैं.इस तरह से उलझा दिया कि उन के अदर छोटी-छोटी इच्छाएं पैंदा हो और उसी को पूरा करने में व लगे रहैं और देश और ममाज की गंभीर समस्याओ पर उनका ध्यान ही नहीं जाए। इन चुनौतियों से पार पाने के रास्ते तलाशने होंगे। ऐसे में भारतीय राजनीति में साहसपूर्ण तरीके से नए प्रयोग करना बक्त की सबसे बडों ज़रूरत है।

मैने पहले भी कहा है कि मेरे काम का असर राजनीति पर पढ़ना तय है। अब वात आ गया है कि राजनीति की समानांतर धारा के जरिए सियासत का मूल्यों और मुद्दों पर बापस लाया जाए। इसी के आधार पर दलीय राजनीति में बड़ी लकीर खिंचनी होगी। इसके लिए दीर्घकालिक काम करते हुए तात्कालिक प्रयास भी करने होगे। सत्ता और दलीय राजनीति में अदर और बाहर से नए प्रयास करने ही होंगे। देश में भारतपरस्त,गरीबपरस्त राजनीतिक की जराह खाली है। इसे भरने के लिए सही नीयत और वैचारिक प्रतिबद्धता के स्राथ काम कर रहे छोटे-छोटे राजनीतिक समूहों की एकजुट करना होगा । ऐसी ताकत को जोड़कर एक राष्टीय मोर्चा भी तैयार करना होगा। क्योकि मूल्यों और मुद्दों पर आधारित राजनीतिक ताकत अभी देश की सबसे बडी जरूरत है।

यह भी स्पष्ट तौर पर दिख रहा है कि समाज के साथ संगठन अपनी ऊहापोह की वजह से तालमेल नहीं बना पा रहें हैं । ऐसी स्थिति में समाज संगठनों को एक तरफ रखते हुए अपनी पद्धति ईजाद कर लेता है। संगठनों की यह समझना होगा कि प्रर्याप्त सक्रियता और प्रतिकार क्षमता नहीं रही तो वे समाज कै द्वारा खारिज कर दिए जाएंगे। मूल्यों और मुद्दों की कीमत पर समाज एकला नहीं देखना चाहता। क्योंकि व्यक्ति से बडा दल, दल से बड़ा देश, व्यक्ति से बड़ा संराठन और संराठन से बड़ा समाज है। ऐसे में यह समझना होगा कि समाज ही सवोंपरी निकाय हैं । समाज के अंतर्गत संराठन आज है और कल नहीं रहेंगे। आज इन बातों को समझने और समग्र रूप है सक्रिय . होने की जरूरत है। यह समझना होगा कि विचार आत्मा है और संगठन देह है। साफ है कि विचार क्या बदलती हैं। काया शाश्बत नहीं है, इसलिए काया से मोह नहीं रखा जाता। विचार ही अजर-अमर होते हैं। शाश्बत -सनातन सत्य शिद्धान्त को धर्म कहते हैं। घर्म ही शाश्बत है। इसका निर्वहन करने के लिए आत्मा समय-समय पर अलग अलग शरीर धारण करती है। शरीर को अपनी संस्थाए है। वह कभी अस्वस्थ होता है तो कभी उसके सामने कोई और समस्या होती है। इसलिए विचार के प्रति प्रतिबद्ध होना अभी की सबले बड़ी जरूरत है।