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भारत परस्त एवं गरीब परस्त विचारधारा


जब हम भारतपरस्त की बात करते है तो हमारा त्तात्पर्य एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण से होता है जिसमें भारत की तासीर और तेवर के हिसाब से उसका पथ तैयार हो और देश की राजनीति उस पथ पर व्यवस्था का संचालन सुनिषिचत करे। इस बाबत शुरुआत विचारधारा के स्तर से ही होती है। हर त्तरफ सामान्य सोच के तौर पर इस धारणा को आगे बताया गया है कि यहां जो कुछ होता है वह गलत है और पश्चिमी देश समेत और भी कई अन्य देशों में जो कुछ होता है वही सही है। प्रचलित राजनीतिक दलों में भी विचारधारा के स्तर से ही इस सोच की झलक स्पष्ट तौर पर मिला करती है। ऐसा सीधा नजर आता है कि चाहे यूपीए हो, एनडीए हो या वामपंथ हो, इन सबमें अलग -अलग विदेशी विचारों और कार्यप्रणाली के नकल की प्रवृति स्पष्ट तौर पर दिखती है।

इसमें यूपीए और एनडीए पर अमेरिका का भूत सवार है। इनके नीति निर्धारक भारतीय विशेषताओ में भरोसा नहीं रखते हुए अमेरिका के पिछलग्गू बनने को ही भारत का रास्ता मानते है। वहीं दूसरी तरफ खुद को वामपंथी कहने वाले लोग अमेरिका की जगह पर चीन को रखकर सारी चीजों को देखते और समझते है। इनके बारे में बुनियादी तौर पर जो बात सामने आ रही है उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि इन्हें ना तो भारत की पहचान है, न परवाह और ना ही भरोसा है। इस बात की पुष्टि इन दलों का रवैया विदेशनीति से लेकर विकास की अवधारणा तक पर देखकर पता चलता है। इन मामलों में प्रचलित सभी दलों, गठबंधनों और सरकार की विदेशपरस्ती देखी जा सकती हैं । जबकि देश की जनता स्वाभाविक तौर पर भारतपरस्त होने की अपेक्षा करती है। इन सभी की विदेशपरस्ती हर स्तर पर स्पष्ट तौर पर दिखती है । इसी में से एक है विकास का मसला। स्वाभाविक तौर पर हर देश के लिए विकास का पथ अलग-अलग होता है। हर देश का अपना भूगोल और अपनी भूसस्कृति होती है। इनका उस देश के विकास में अहम भूमिका होती है। हर समाज के अपने नैतिक और सामाजिक मूल्य होते है और इनको अनदेखी करते हुए कहीं कुछ हुआ और उसी का अनुकरण करने लगना तो समझदारी नहीं है। पर दुर्भाग्य से हो ऐसा ही रहा है। मौजूदा व्यवस्था को चलाने वाले इसी विदेशपरस्ती को अपनी सफ़लत्ता के तौर पर भुनाने का हर संभव प्रयास करते नजर आते है।

जब हम अपने देश की बात करते है तो हमें यह स्पष्ट तौर यर समझ लेना चाहिए कि अमेरिका में जो हो रहा है वैसा ही भारत में होने की इच्छा रखना ठीक नहीं है। हमें यह भी समझना होगा कि अमरिका के विकास में वहां की परिस्थितियों का अहम योगदान है और उसका विकास पथ वहां की खूबियों को ही समेटे हुए है। इग्लैंड और यूरोप का विकास पथ भी वहां की विशेषताओं को ही समेटे हुए है। इसलिए भारत के लिए भारतपरस्त विकास पथ यहां की खूबियों को समेटत्ते हुए ही तय किया जा सकता है। पर यह बात आजादी के छह दशक गुजर जाने के बावजूद भी व्यवस्था चलाने वालों के समझ में नहीं आ रहीं है। इसी का परिणाम है कि देश का आमजन इसे कुव्यवस्था मानने लगा है ।

भारतपरस्त की बात करने के दरमियान हमें यह भी समझना होगा कि एक जगह का विकास पथ दूसरे जगह के लिए भी उपयोगी हो ऐसा आवश्यक नहीं है। अपने-अपने यहां की परिस्थितियों को मानते हुए वहां की तासीर और तेवर के हिसाब से ही अपना-अपना विकास पथ तय करना चाहिए। हम भारतपरस्त की बात करते है तो इन सब बातों को भारत के नजरिए से देखना, समझना, सवारना और दुरुस्त करना इसमे शामिल है। इसके अलावा दुनिया को भी भारत के नजरिए से देखना और उसी के आधार पर उनसे बर्ताव करना भी इसी में शामिल है। वहीं अभी जो मुख्यधारा की राज़नीति में है वे तो ज्यादा से ज्यादा ग्लोबल होते जा रहे है और वे तो लोकल यानि स्थानीय मसलों को हिकारत के नजर से देखने के ही अभ्यस्त होते जा रहे हैं। ऐसे में उनसे भारतपरस्त होने की उम्मीद तो की ही नहीं जा सकती है।

भारतपरस्त की बात करते हुए हम यह मानते है कि किसी भी देश की प्रगति और दुनिया में उसकी स्थिति की सही-सही अभिव्यक्त करने का जरिया उसका सांस्कृतिक जीडीपी होगा। पर सांस्कृतिक जीडीपी की अवधारणा को तो यूपीए, एनडीए और बामपंथी मानेगें ही नहीं। खंड-खंड में वे हर चीज को देखने के आदी हैं। समृद्धि और संस्कृति के बीच संतुलन साधते हुए ही सही मायने में विकास हो पाएगा, यह बात उन्हें तब समझ में आएगी जब अमेरिका से कोई अलगोर यह बात कहेगा। वे भारतीय ढंग से सोचने तक में खुद को असमर्थ पाते हैं। वहीं हमारा मानना है कि किसी भी देश के विकास में वहां की सामाजिक फ्लो और सास्कृतिक परंपरा की अहम भूमिका रहती है।

इसलिए उन्हें विकास के संदर्भ में यह बात समझ में ही नहीं आएगी कि भारत्त के लिए तो इसका पैमाना यह होगा कि जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ी या नहीं, जलस्तर में सुधार हुआ या नहीं या फिर वनाच्छादन और मनुष्य-मवेशी अनुपात बढा कि नहीं। भारतपरस्त की बात करने और इस दिशा में सोचने वालों को यह बात समझना हैं। इन सब में अगर बहुत ज्यादा असंतुलन बढेगा तो इसका समाज और राजनीति पर भी स्वाभाविक तौर पर असर पड़ेगा । इससे चारो तरफ अस्वास्थ्यकर प्रवृतियों को ही बढावा मिलेगा । हम लोगों को प्रसन्नता सूचकांक यानि हैप्पीनेस इंडेक्स की बात को स्रोचना होगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यकता पूरी हों। इसके साथ ही प्रकृति का भी पोषण होता चले यह जरूरी हैं। सस्कृति पुष्ट होती चले तब ही जीवन सुखमय होगा। हमारी सोच स्वदेशी और विकेन्द्रीकरण पर आधारित होनी चाहिए। इसीको हम भारतपरस्त कहते है। जिसका आधार स्वाभाविक तौर पर जन, जल जमीन, जाल और जानवर होगा। इसके अधार पर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचनाओं को खडा करना होगा। ड़सके लिए आवश्यकता के अनुरूप मरम्मत और बदलाव करते चलना होगा। तब ही भारतपरस्त व्यवस्था के निर्माण की बात पूरी हो पाएगी।

भारतपरस्त की बात करते हुए ही हमें इस बात पर भी एक स्पष्ट समझ बना लेने की जरूरत महसूस होती है कि विदेशी मूल का कोई भी व्यक्ति भारत का राष्टपति, प्रधानमत्री और सेनाध्यक्ष नहीं बन सकता। इससे कई तरह के खतरे स्वाभाविक तौर पर देश पर मंडराने लगते है। भारतपरस्त की बात करते हुए ही हमें यह समझ लेना होगा कि पूर्ण गौ हत्या बंदी इस देश की तासीर के हिसाब से अहम ज़रूरत है। भारत की स्वाभाविक अर्थव्यवस्था में भी इसकी अहम भूमिका है। साथ ही यह एक बडे वर्ग के लिए आस्था का केंद्र भी है। इस नाते हमें गोहत्या बंदी तो सुनिश्चित करना ही चाहिए। इसके अलावा मधनिषेध की दिशा में भी ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।

जिस भारतपरस्त व्यवस्था की बात यहां की जा रहीं है उसमें नदिया, पहाड़, वृक्ष, तीर्थ और पूजास्थल के संरक्षण को भी सुनिश्चित करना शामिल है। इन सबका समाज के समग्र विकास पर अपना अलग और विशेष महत्व है और इनका संरक्षण नहीं होने की वजह से एक खास तरह का असंतुलन कायम हो रहा है। भारतपरस्त व्यवस्था में परिवार संस्था को मजबूत बनाना शामिल है। साथ ही समाज़सत्ता को हर हाल में ताकतवर तो बनाना ही होगा।

भारतपरस्त व्यवस्था में व्यवस्था संचालन के कार्य के लिए भारतीय भाषाओँ के प्रयोग पर जोर रहना स्वाभाविक है। इसके अलावा भारत की कृषि उपज को दुगना करना भी हमारा लक्ष्य होना चाहिए। इस बाबत हमें यह तय करना होगा कि यह कार्य बगैर देश के किसानों के हितो की नुकसान पहुंचाए करना होगा। अभी तक यह दखने में आया है कि उपज तो वही है लेकिन साथ ही साथ दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से किसानो की आत्महत्या भी बढ़ती गई डै। हमें इस प्रवृति को बदलते हुए किसान और किसानी की रक्षा करनी होगी। इसके अतिरिक्ति कोई भी व्यवस्था भारतपरस्त नहीं हो सकती है।

भारत्तपरस्त की बात करते हुए हमें यह भी तय करना होगा कि हम विकेंद्रीत उद्यम खडा करेगे। तब ही सही मायने में अर्थव्यवस्था का समग्र विकास हो पाएगा और इससे समाज भी सकारात्मक तौर पर प्रभावित हो पाएगा। पिछले दिनों पूरे दश ने ऊर्जा जरूरतों की आड़ में अमरिका के साथ संप्रभुत्ता को गिरवी रखकर परमाणु समझौता होते देखा। इस बारे में पहले भी बात की जा चुकी है कि परमाणु ऊर्जा भारत को ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति के लिहाज से कोई उपाय नहीं हैं आज भारत की जरूरत है अक्षय ऊर्जा । भारतपरस्त की बात्त करते हुए हमें अक्षय ऊर्जा के विकेंद्रित उपाय करने पर भी जोर देना होगा । इसके साथ ही जल संरक्षण के स्थानीय परम्परागत उपायों का आग्रह भी रखना होगा।

दरअसल , जब देश आजाद हुआ था तब यह उम्मीद स्वाभाविक तौर पर जगी थी कि अब भास्तपरस्त नीतिया पर अपनी व्यवस्था चलेगी। पर हुआ इसका ठीक उलटा। इस व्यवस्था ने साठ साल में हर ओर असत्तोष की लहर दौड़ाई। इसकी जड में है हमारा संविघान। संविधान की खामियों की वजह से ही कुव्यवस्था कायम हुई। हमें इसी कुव्यवस्था को सुव्यवस्था में बदलते हुए नई संविधान सभा के गठन पर बल देना होगा, जो देसी सोच और बिकेंद्रीकरण की दिशा में काम करें। इसी कामो में आगे बढ़त्ते हुए जनप्रतिनिधियों के विशेष अधिकारों को समाप्त करना भी भारतपरस्त सोच का अहम हिस्सा है।

भारतपरस्त की बात करते हुए हमें इस बात को भी जेहन में रखना होगा कि अखंड भारत हिंदुस्थान का प्राकृतिक सत्य है। इसलिए राजनैतिक लक्ष्य भी यही होगा। सास्कृतिक रूप से एक बहुराज्जीय राष्ट्र की संकल्पना के लिए काम करना होगा। भारतपरस्त व्यवस्था में राष्ट्रीय नागरिकता पहचान पत्र बनेगा। इससे कई समस्याओ से पार पाना आसान हो जाएगा।

गरीबपरस्त जब हम गरीबपरस्त की बात करते है तो उसमें स्वाभाविक तौर पर समाज के सबसे आखिरी पायदान पर जीवन बसर करने वालों तक लाभ पहुचाने वाली नीतियों का निर्धारण सबसे पहले आता हैं। इस बात से हम सब वाकिफ है कि आज भारत में नीति निर्धारण का कार्य थैलीशाहों के इशारे पर हो रहा है। सरकारें पूंजीपरस्त हो गई हैं। इसमें किसी एक दल और गठबंधन का नाम नहीं लिया जा सकता बल्कि दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद सत्य यही है कि सभी प्रचलित दल और गठबंधन पूजीपरस्त हो गए हैं। स्वाभाविक ही है कि इन दलों और राठबंघनों की सरकारें भी पूंजीपरस्त होगी ।

थैलीशाहों का सत्ता व्यवस्था और नीतियों के निर्धारण में यहीं दखल का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ औद्योगिक घराने बाक़यदा यह राय जाहिर करने लगे है कि कौन सा मंत्रालय किस नेता को मिलना चाहिए। इससे भी दुखद यह है कि कई मौकों पर वे जो चाहते वह करवाते हैं। इसके परिणामस्वरूप जो नीतिया बन रही है उस वजह से देश में गरीब और भी गरीब होते जा रहे है और अमीरों की अमीरी दिनोदिन बढ़ती ही जा रहीं हैं।

थैलीशाहों के इशारों पर चल रही सत्ता व्यवस्था जिन नीतियों को बना रही है उसके परिणामस्वरूप देश में एक खास तरह का सामाजिक और आर्थिक संतुलन कायम हो रहा हैं। इसके भयावह नतीजे कई रूप में देखने को आ रहे हैं। किसानों के देश कहे जाने वाले हिंदुस्तान में हर साल हजारों किसान आत्महत्या कर रहे हैं। अभी हाल ही में इस संदर्भ में जो सरकारी आकडे आए है उसके मुताबिक 2007 में सोलह हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की। रारीबो के नाम पर अपनी सियासत चमकाते वाले राजनीतिक दल जब सत्ता में आते है तो उनके हक़ और हित के खिलाफ काम करते हैं। इसकी पुष्टि अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट से भी हो जाती हैं। इसके मुताबिक अभी भी देश के 84 करोड़ लोग रोजाना बीस रुपए से कम पर जीवन बसर कर रहे हैं।

गरीबपरस्त की बात करते हुए इनके हक और हित स्वाभाविक तौर पर सर्वोपरि है। अभी गरीबी निर्धारित करने का जो पैमाना है वह बताने से ज्यादा छुपाता है। इससे जो आकडे सामने आते है वे भ्रमित करने वाले है। सरकार और व्यवस्था ने विकास का पैमाना शेयर बाजार की उछाल, जीडीपी और विदेशी मुद्रा भडारं को ही मान लिया है। पर अब यह बात हर कोई जानता है कि इनके सहारे जो गुलाबी तस्वीर सरकार पेश करती है उसका लाभ मुट्ठी भर लोगों को ही मिल पा रहा है। देश में एक तरफ तो अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है वहीं गरीबी और गैरबराबरी भी जमीनी स्तर पर बढ रही है। भारत के सबसे धनी व्यक्ति की आय और औसत गाते व्यक्ति आय में नब्बे लाख गुना का अंतर है।

यह व्यवस्था किस कदर अमीरपरस्त हो गई है और गरीबो के हक और हित के खिलाफ काम कर रही है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गांवों में रहने वाले दस प्रतिशत लोगों को एक दिन के गुजारे के लिए महज नौ रुपए ही उपलब्ध हो पा रहे हैं। बदहाली का आलम तो यह है कि झारखंड और राजस्थान के आदिवासी इलाकों में रहने बाले 99.8 फीसदी परिवारो को पूरे साल में महीने भर भी दो वक्त की रोटी नहीं मिल पा रही है। वही अमीरपरस्त व्यवस्था से उपजी नीतियों का परिणाम यह है कि भारत में पचीस हजार ऐसे लोग है जिनके पास सत्तर लाख या उससे अधिक कीमत की एक या उससे ज्यादा मोटर गाड़िया हैं। साथ ही देश में तकरीबन दस लाख लोग ऐसे हैं जिनकी कलाई पर ढाई लाख से लेकर पचीस लाख तक की घड़ियाँ बंधी है। देश में हर स्तर पर व्याप्त गैरबराबरी का एक उदाहरण यह भी है कि भारत मे वेतन पाने वालों में शीर्ष के बीस प्रतिशत लोगों का कब्जा 56 प्रतिशत पर है जबकि नीचे के बीस प्रतिशत लोरा महज 3.6 फीसदी वेतन ही पाते है। अनुमान लगाया गया है कि भारत के सबसे कम आमदनी वाले और सबसे अधिक आमदनी वाले व्यक्ति में तकरीबन एक करोड़ गुना का अंतर है।

जिन स्थितियों की बात्त की जा रहीं है वो एक दिन में नहीं उपजी है। इसके लिए आजादी से पहले की परिस्थितियां और उसके बाद विदेशपरस्त मानसिकता के साथ काम करने वाली अमीरपरस्त सरकारे पूरी तरह जिम्मेदार है । गरीबपरस्त की बात करते हुए हमारा मक़सद इन ख़ामियों का दूऱ करना और इससे उपजी बुराईयों से निजात पाना होना चाहिए। क्योंकि ऐसा किए बगैर सामाजिक समानता और संतुलन का लक्ष्य कभी पूरा नहीं हा पायेगा । गरीबपरस्त नीतिया ही संवाद, सहमति और सहकार का आधार बनेगी। इन्हीं की बदौलत हर सामाजिक काम में सहभागिता बढेगी और समाज में समरसता कायम होगी।

गरीबपरस्त की बात करते हुए हमें यह हर हाल में सुनिश्चित करना चाहिए कि सबको रोटी मिले और सबको काम मिले। हर हिन्दुस्तानी की बुनियादी आवश्यकता पूरी हो। कोई भी व्यक्ति अभाव में अपनी बुनियादी जरूरतों से महरूम न रह पाए यह हर हल में सुनिश्चित करना होगा । हर व्यक्ति की रोटी , कपडा और मकान की जरूरतें पूरी हों। वर्ग और समुदाय आधारित असमानता को हर हाल में खत्म किया जाए। जाति आधारित भेदभाव को तो समाप्त करना स्वाभाविक ही है। हर माँ के बच्चे को मनचाही शिक्षा मिल सके और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें पूरी हो सके, यह भी हर हाल में सुंनिश्चित करना होगा। गरीबपरस्त व्यवस्था में समान शिक्षा की व्यवस्था करना भी बेहद अहम है। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संसाधनों के अभावों में कोई भी आवश्यक शिक्षा से वंचित नहीं रह पाए। तब ही सही मायने में हर स्तर पर व्यवस्था के संचालन में हर वर्ग की सहभागिता बढेगी । ऐसा होने पर ममाज के अलग-अलग वर्ग में आसानी से संतुलन भी कायम हो पाएगा।

गरीबपरस्त की बात करते हुए हमारे लिए स्वाभाविक तौर पर कुपोषण और भूखमरी जैसी समस्या का समाधान दूढना आवश्यक डै। आजादी के छह दशक गुजरने के बावजूद आज भी बडी संख्या में लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। सरकारी आंकड़े ही बताते है कि आज भी देश के पाँच साल से कम उम वाले तकरीबन 46 प्रतिशत बच्चे कुपोषणा की मार होत रहे हैँ। कुपोषणा से मौत की खबरें मीडिया में अक्सर आती हैं। दरअसल, कुपोषणा की समस्या से पार पाने के लिए सबसे पहले महिलाओ के लिए 138 । व्यवस्था परिवर्तन की राह आवश्यक आहार की व्यवस्था करनी होगी। जब तक रार्भवती महिलाओं को भरपेट भोजन और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पाएगी तब तक कुपोषण की समस्या से पार नहीं पाया जा सकता है। जब हम गरीबपरस्त व्यवस्था की बात करते है तो इन समस्याओँ से निजात पना स्वाभाविक हो जाता है।

गरीबपरस्त व्यवस्था के तहत सबके लिए हर रोज हर किसी के आहार में आधा किलो दूध, आधा किलाे अनाज, आधा किलो सब्जी और आधा किलो फल की व्यवस्था करना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। गरीबपरस्त व्यवस्था के तहत विकास के पैमाने को बदलना भी आवश्यक हो जाता है। विकास का पैमाना पंच 'ज' का विकास होना चाहिए; ये पाच 'ज' है- जन, जल, जाल, जमीन और जानवर । गरीबपरस्त को बात करते हुए किसान और किसानी के हित में नीतियों का निर्धारण भी स्वाभाविक तौर बेहद आवश्यक हो जाता है। हर देश को अपनी तासीर और अपना तेवर होता है। इसी के आधार पर वह अपने विकास पथ का चयन करता है। भारत के संदर्भ में भी यही बात लप्पू होती है। भारत का समग्र विकास तब तक नहीं हो सकता है जब तक यहा के किसान और किसानों को लाभ पहुचाने वाली नीतियों नहीं बनाई जाएं। आज भी भारत की आबादी का बड़। हिस्सा प्रत्यक्ष तौर पर कृषि यर निर्भर है।

गरीबपरस्त व्यवस्था की बात करते हुए यह स्वाभाविक हो जाता है कि स्थानिक चिकित्सा को बढ़ावा दिया जाए। आज भी देखा जाता है कि कई गांवों में लोग बीमार होते है तो उनमें से कई लोग अस्पताल पहुचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। वहीं ऐसे लोगों की संख्या भी बहुत है जो बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओ का लाभ भी नहीं लै पात्ते और काल के राल में समा जाते है। गर्वपरस्त की बात करते हुए हमें इन समस्याओँ से हर हाल में निजात पाने को तरकीब तलाशनी होगी।।

गरीबपरस्त व्यवस्था की बात करते हुए यह सुनिश्चित करना आवश्यक हो जाता है कि आय के स्तर यर व्याप्त अराजकता की हर हाल में दूर किया जाए। गरीबपरस्त व्यवस्था में देश के राष्ट्रपति के वेतन और न्यूनतंम वेतन में दस गुना से ज्यादा का फर्क नहीं होगा। गरीबपरस्त व्यवस्था को इच्छा रखने वालों के लिए इस बात पर सहमति बनाना होगा कि ऐसी व्यवस्था में जन प्रतिनिधियों का वेतन देश के न्यूनतम वेतन के बराबर होगा । आय के स्तर पर व्याप्त अराजकता का दूर करने के लिए यह जरूरी है कि बेरोजगारी को दूर करने के लिए आवश्यक नीतिया बनाई जाए और उसे अमली रूप दिया जाए। जब रोजगार के अवसर उपलब्ध होगे तो कई स्तर पर व्याप्त असमानता खुद-ब-खुद दूर होगी। आय के स्तर पर व्याप्त असमानता और इससे उपजी अराजकता पर लगाम लगाने के लिए गरीबपरस्त व्यवस्था में कर सुधार की -दिशा में भी काम करना होगा।