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प्रकृति केन्द्रित विकास


जब हम विकास की बात करते है तो प्राय: हम विकास को अमेरिकी अवधारणा की ही दोहराने लगते हैं। हम भूल जाते है कि विकास के संदर्भ में .भारत की भी एक सोच रही है। भारत ही क्या , दुनिया के प्रत्येक कोने में विकास की व्याख्या अलग-अलग ढंग से की गई हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बसने वाले समाजों के रहन-सहन, खान-ज, उनकी राजनीति, संस्कृति , उनके सोचने और काम करने के तौर -तरीके, सब जिस मूल तत्व से प्रभावित हौते हैं, वह है वहा की भौगोलिक परिस्थिति। उसी के आलोक में वहा जीवन दृष्टि,जीबनलक्ष्य. जीबनादज्ञा, जीवन मूल्य , जीवन शैली विकसित होती है। उसी के प्रभाव में वहा के लोगों की समझ बनती है और साथ ही दुनिया में उनकी भूमिका भी तय होती जाती हैं।

भारत भी ऐसा एक देश है जहा साल का असर पड़ा । उसके कारण यहा विकेन्द्रीकरण , विविधता, अनैतिक सुख का महत्व, मनुष्य प्रकृति का पारस्परिक संबंध जैसी बात्तों को विशेष महत्व दिया गया हैं । उसी आधार पर यहा सुख की समझ बनी। विश्व दृष्टि, जीवन दृष्टि बनी। दुनिया को बेहतर बनाने में योगदान करने की इच्छा और सामर्ध्व विकसित हुई । यहा समृद्धि और संस्कृति के संतुलन का ध्यान रखना आवश्यक माना गया। सुख के भौतिक-अभौतिक पहलुओं की समझ बनी। तदनुसार समाज संचालन को बिघाएं विकसित हुईं। घर्मसत्ता, समाज़सत्ता, राजसत्ता, अर्थसत्ता की संरचनाएं एवं उनके पारस्परिक संबंध, स्वायत्तता आदि को व्यवस्था बनी। समय-समय पर परिमार्जन को व्यवस्था भी बनती गई। देसी समझ के साथ समस्याओँ के समाधान और हर प्रकार की सत्ता कै विकेन्द्रीकरण को पर्याप्त महत्व दिया राया। विकेन्द्रीकरण , विविधीकरण, स्थानिकीकरण की अवधारणा को समाज व्यवस्था की निरत्तस्ता एबं गतिशीलता के लिए आवश्यक समझा गया । इन सब जाती की भारत की तासीर कहा जा सकता हैं।

बिगत 200 वर्षों में इस तासीर को समय-समय पर मिटाने और बदलने की कोशिश होती रही। अभी यह कोशिश अंधाधुध वैश्वीकरण एबं बाजारवाद के हमले के रूप मैं हमारे सामने है। विचार, व्यवस्था , व्यवहार तीनों स्तरों पर इसका ग्रभाब है। यह चुनौती एक दानवी चुनौती है क्योकि इसमें न तो मनुष्य की, न तो उसके सुख की और न ही समाज और प्रकृति की कोई परवाह है। इसकी सोच आक्रामक, पाशविक, प्रकृति विरोधी एल मानव विरोधी है। इसके लक्षण है केन्द्रीकरण , वैस्वीकरणा, एकरूपीकरन एवं बाजारीकरणा। यह अर्थसत्ता को सर्वोपरि बनाकर राजसत्ता का उपयोग करती है और इस प्रकार समाजसत्ता तथा घर्मसत्ता को नष्ट करके आसुरी संपदा , आसुरी साम्राज्य बनाने के लिए प्रयासरत है। हमारे ऊपर जो आसुरी हमला हो रहा है हैं उसमें मनुष्य की भौतिक इच्छाओं को हवा देकर उसके जीवन के शेष अनैतिक पहलुओं को नकारने की प्रवृति अत्तनिंहित है। इसी के अनुसार सुख एल विकास आदि को परिभाषित किया जाता है और सभी माध्यमों का उपयोग करते हुए इसे जन-जन के मन में बिठाने की कोशिश की जाती है। जबकि वास्तविकता यह है कि विकास की यह भ्रामक, एकांगी एव प्रदूषित संकल्पना है।

भारत में विकास का मतलब है शरीर, मन, बुद्धि है आत्मा का सतुंलित्त सुखा अस्तरिक एव बाहरी अमीरी का संतुलन रहे। तदनुसार सामाजिक, आधिक , राजनैतिक, सास्कृतिक व्यवस्था ही। तदनुसार शिक्षा संस्कार भी ही। समाज मैं समृद्धि और सस्कृति का संतुलन बना रहे, वहीं सही विकास होगा। विकास की अवधारणा समाज से जुडी हुई है। हम समाज कैसा चाहते है? इसी से तय होगा कि विकास हुआ या नहीं। वास्तविक विकास मानवकेन्द्रित न होकर पारिस्थितिकी केंद्रित होता है, एक ऐसी व्यवस्था जिसमें जमीन मैं जल , जंगल , जानवर, जन का परस्पर पोषण होता रहे । व्यक्ति का परिवार, पडोस, ममाज, दुनिया, प्रकृति के साथ तालमेल बना रहे। वही तकनीक सही मानी जाएगा जो आर्थिक यक्ष के साथ परिस्थितिकी एल नैतिक पक्ष का भी ध्यान रख सकै।

मौजूदा दौर में लबी-चौड़ी सड़कों के निर्माण और जीडीपी के बढने को ही विकास बताया जा रहा है। इससे भी बुरी बात यह है कि सत्ता में बैठे लोग स्वरों को भी इसी अवधारणा को सच मानने के लिए बाध्य कर रहे हैं। मीडिया का एक बहुत बडा वर्ग उनके साथ है। इसका असर यह हुआ कि बहुत सरे लोग शेयर बाजार की उछाल और विदेशी मुद्रा भडार के साथ-साथ शॅपिंग माल्स की बढती संख्या को ही विकास मान बैठे हैं। परन्तु हकीकत यह नहीं है। जिसे विकास बताया जा रहा है वह बस्तुत: विकास नहीं है। अगर सही मायने में विकास हुआ होता तो क्या देश में चारों और खुशहाली नहीं आई होती ? क्या यहा के किसान आत्महत्या करने को मजबूर नहीं होते ? एक बात तो साफ है कि विकास की लेकर समाज में भयानक भ्रम फैलाया गया है और अभी भी यह प्रवृति थमी नहीं है।

भारतीय संदर्भ में विकास के साथ कुछ बुनियादी शर्त जुडी हैं। यहा बास्तबिक विकास कार्य उसी को कहा जा सकता है जिसमें अंतिम व्यक्ति का हित सर्वोपरि रहै। जबकि आज हो रहा है इसके ठीक उलटा। आज जो नीतिया बनाईं जा रही है, उनमें आम आदमी की बजाए पूंजीबादी एव प्रभावशाली समूहों के हित का ध्यान रखा जाता है। वर्तमान संप्रग सरकार की माने तो आज भी देश के 84 करोड़ लोग बीस रुपए रोजाना पर जीवन बसर करने को मजबूर है। आज जहा एक और विकास के बढ़-चढ़ कर दावे किए जा रहे है वहा इन लोगों की बात करने बाला कोई नहीं है । यह कैसा विकास है जिसमें अमीर की अमीरी और गरीब की गरीबों बढती ही जा रही है। गैरबराबरी की खाई दिनोदिन चौडी होती जा रहीं है। एक खास तरह की सामाजिक और आर्थिक असमानता समाज में बढ़ती हुईं देखी जा सकती है।

भारत में विकास तब तक सतही और खोखला माना जाएगा जब तक यहां के किसान सुखी और समृद्ध नहीं हैं। आजादी के बाद के शुरुआती दिनों में देश की किसानो को पटरी पर लाने के लिए सरकारी तौर पर कई तरह के प्रयास हुए। लेकिन यहां भी किसानों के सामरिक ज्ञान और जीवनशैली को दरकिनार करते हुए पश्चिमी तौर-तरीके थोप दिए गए। परिणाम यह हुआ कि एक बार अनाज का उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन उस से जुडी कई समस्याएं भी उत्पन्न हो गई। जब से देश में 'तथाकथित उदारवाद' की बयार बहनी शुरू हुईं है तब से किसानों का जीवन और मुश्किल हो गया है। अब तो संकट किसानों के अस्तित्व का ही है। हम अगर गौर करें तो हमारे ध्यान में आएगा कि 1991 के बाद किसानों की आत्महत्या काफी तेजी से बढी है। अगर हम सरकार के बजट पर निगाह डाले तो पता चलेगा कि इस दौरान कृषि को मिलने वाले बजट में भी कमी होती गई। अब सीधा सा हिसाब है कि अगर निवेश घटेगा तो स्भाविक तौर पर उस क्षेत्र का विकास बाधित हो जाएगा। अभी देश के किसानों और किसानी की जो दुर्दशा है, वह इन्ही अदूरदर्शी नीतियों की वजह से हैं। इस बदहाली के लिए देश का अदूरदर्शी नेतृत्व भी कम जिम्मेदार नहीं है। बीते सालों के अनुभव से साफ़ है कि किसानो की हालत को सुधारे बगैर हम भारत का विकास नहीं कर सकते।

भारत के विकास की दिशा में सोचने पर मेरे ध्यान में आता है कि ऐसी नीतियों को अपनाया जाना चाहिए, जिनसे परिवार की इकाई मजबूत बने । दरअसल, भारत की संरचना ही ऐसी है कि हम यहाँ एक-दूसरे के साथ एक खास तरह की डोर में बंधे बगैर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं। हमारे सामाजिक संबंधों को तय करने में भी हमारे संस्कारों की अहम् भूमिका होती है। हम सब अपने-अपने परिवार से ही संस्कारं ग्रहण करते हैं। जब परिवार नामक इकाई मजबूत रहेगी तभी सही मायने में उसके सदस्यों के व्यक्तित्व का समग्र विकास हो पाएगा। आजकल देखने में आ रहा है कि परिवार नामक इकाई कमजोर होती जा रही है। अलगाव बढ़ता जा रहा है। लोग आत्मकैन्द्रित होते जा रहे हैं। इसका असर समाज में साफ तौर पर दिखने लगा है। भय और असुरक्षा का माहौल बढ़ता जा जाती है। जबकि वास्तविकता यह है कि विकास की यह भ्रामक, एकांगी एक प्रदूषित संकल्पना है। भारत में विकास का मतलब है शरीर, मन, बुद्धि है आत्मा का सतुंलित्त सुखा अस्तरिक एल बाहरी अमीरी का संतुलन रहे। तदनुसार सामाजिक, आधिक , राजनैतिक, सास्कृतिक व्यवस्था ही। तदनुसार शिक्षा संस्कार भी ही। समाज मैं समृद्धि और सस्कृति का संतुलन बना रहे, वही सही विकास होगा। विकास की अवधारणा समाज रने जुही हुई है। दृम समाज कैसा चाहते है? इसी से तय होगा कि विकास हुआ या नहीं। वास्तविक विकास मानव केन्द्रित न होकर पारिस्थिति केन्द्रित होता है, एक ऐसी व्यवस्था जिसमें जमीन मे जल, जाल, जानवर, जन का परस्पर पोषण होता रहे। व्यक्ति का परिवार, पडोस, समाज, दुनिया, प्रकृति के साथ तालमेल बना रहे। वही तकनीक सही माना जाएगा जो आर्थिक पक्ष के साथ परिस्थितिकी एक नैतिक पक्ष का भी ध्यान रख सके। मौजूदा दौर में लबी-चौड़ी सड़कों के निर्माण और जीडीपी के बढने को ही विकास बताया जा रहा है। इससे भी बुरी बात यह है कि सत्ता में बैठे लोग स्वयं भी इसी अवधारणा को सच मानने के लिए बाध्य कर रहे हैं। मीडिया का एक बहुत बड़ा वर्ग उनके साथ हैं। इसका असर यह हुआ कि बहुत सारे लोग शेयर बाजार की उछाल और विदेशी मुद्रा भंडार के साथ-साथ शापिंग माल्स की बढती संख्या को ही विकास मान बैठे हैं। परन्तु हकीकत यह नहीं है। जिसे विकास बताया जा रहा है वह बस्तुत: विकास नहीं है। अगर सही मायने में विकास हुआ होता तो क्या देश में चारों और खुशहाली नहीं आई ढोती? क्या यहां के किसान आत्महत्या करने को मजबूर होते ? एक बात तो साफ है कि विकास को लेकर समाज में भयानक भ्रम फैलाया गया है और अभी भी यह प्रवृति थमी नहीं है। भारतीय संदर्भ में विकास के साथ कुछ बुनियादी बातें जुडी हैं। यहां वास्तविक विकास कार्य उसी को कहा जा सकता है जिसमें अंतिम व्यक्ति का हित सर्वोपरि रहे। जबकि आज हो रहा है इसके ठीक उलटा। आज जो नीतिया बनाईं जा रही है, उनमें आम आदमी की बजाए उद्योगपतिओं एवं प्रभावशाली समूहों के हित का ध्यान रखा जाता है। वर्तमान संप्रग सरकार की माने तो आज भी देश के 84 करोड़ लोग बीस रुपए रोजाना पर जीवन बसर करने को मजबूर है। आज जहां एक ओर विकास के बढ़-चढ़ कर दावे किए जा रहे है वहां इन लोगों की बात करने वाला कोई नहीं है ।

यह कैसा विकास है जिसमें अमीर की अमीरी और गरीब की गरीबी बढती ही जा रही है। गैरबराबरी की खाई दिनोदिन चौडी होती जा रहीं है। एक खास तरह की सामाजिक और आर्थिक असमानता समाज में बढ़ती हुईं देखी जा सकती है। भारत में विकास तब तक सतही और खोखला माना जाएगा जब तक कि यहां के किसान सुखी और समृद्ध नही हैं। आजादी के बाद के शुरुआती दिनों में देश की किसानो को पटरी पर लाने के लिए सरकारी तौर पर कई तरह के प्रयास हुए। लेकिन यहा भी किसानों के सामरिक ज्ञान और जीवनशैली को दरकिनार करते हुए पश्चिमी तोंर-तरोकै थोप दिए गए। परिणाम यह हुआ कि एक बार अनाज का उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन उससे जुडी कई समस्याएं भी उत्पन्न हो गई। जब से देश में तथाकथित 'आर्गेनिक उदारवाद' की बयार बहनी शुरू हुईं है तब से किसानों का जीवन और मुविकल हो गया है। अब तो संकट किसानों के अस्तित्व का ही है। हम अगर गौर करें तो हमारे ध्यान में आएगा कि 1991 के बाद किसानों की आत्महत्या काफी तेजी से बढी है। अगर हम सरकार के बजट पर निगाह डाले तो पता चलेगा कि इस दौरान कृषि को मिलने वाले बजट में भी कमी होती गई। अब सीधा सा हिसाब है कि अगर निवेश घटेगा तो स्वाभाविक तौर पर उस क्षेत्र का विकास बाधित हो जाएगा। अभी देश के किसानों और किसानी की जो दुर्दशा है, वह इन्हें अकूदशंगें नीतियों की वजह से हैं। इस बदहाली के लिए देश का अकूदर्श नेतृत्व भी कम जिम्मेदार नहीं है। बीते सालों के अनुभव से साफ़ है कि किसानो की हालत को सुधारे बिना हम भारत का विकास नहीं कर सकते। भारत के विकास क्री दिशा में सोचने पर मेरे ध्यान में आता है कि यहा … नीतियों को अपनाया जाना चाहिए, जिनसे परिवार की इकाई मजबूत्त दरअसल, भारत की संरचना ही ऐसी है कि हम यहा एक-दूसरे से एक खास तरह की डोर में बधे बगैर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं। हमारे सामाजिक संबंधों को तय करने में भी हमारे संस्कारों की भूमिका होती है। हम सब अपने-अपने परिवार से ही संस्कारं लेते हैं। जब परिवार नामक इकाई मजबूत रहेगी तभी सही मायने मैं व्यक्तित्व का समग्र विकास हो पाएगा। आजकल देखते है कि पंरिवार नामक इकाई कमजोर होती जा रही है। अलगाव बडा है। लोग आत्मकैन्द्रित होते जा रहे हैं। इसका असर समाज में दिखने लगा है। भय और असुरक्षा का माहौल बढ़ता जा रहा है। सोचने का दायरा सिमट कर रह गया है। अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी करने को मानसिकता में आज लोग आ गए हैं। अगर हम वाकई इस दिशा में सुधार करना चाहते है तो हमारी नीतियां ऐसी हों जो परिवार नामक इकाई को मज़बूत कर सकें।

देश के विकास के बारे में जब हम सोचें तो यह बात भी जेहन में रहनी चाहिए कि इसके लिए नारी की सुरक्षा, मर्यादा और सहभागिता सुनिश्चित करना बहुत जरूरी है। भारत में नारी को मातृशक्ति का दर्जा दिया गया है। पर हकीक़त में यह धारणा बस किताबों में ही रह गई है।

व्यावहारिक तौर पर समाज में महिलाओँ को वह प्रतिष्ठा नहीं मिल पाई है, जिसकी हकदार वो हैं। हमें राष्ट्र के विकास की नीतियों के निर्धारण के साथ इस बात का ख़्याल रखना होगा। आजादी के साठ साल गुजरने के बाबजूद हम देख सकते है कि सार्वजनिक क्षेत्र में महिलाओँ की भागीदारी अपेक्षाकृत कम है। ऊंचे ओहदों की बात करें तो वहां महिलाए और भी कम दिखती है| अगर हम समग्र विकास चाहते हैं तो आधी आवादी की सहभागिता को बढाए बगैर ऐसा नहीं हो सकता।

देश के विकास के दौरान समृद्धि और संस्कृति का संतुलन बना रहना बेहद ज़रुरी है। आजकल देखा जा रहा है कि समृद्धि के लिए संस्कृति की उपेक्षा की जा रहीं है। समृद्धि भी जनसाधारण की नहीं बल्कि प्रभावशाली लोगों की। देश की नीतिया पूंजीपरस्त हो गई हैं और उसमें थैलीशाहों का हित सर्वोपरि हो गया है। ऐसे में समृद्धि और संस्कृति का संतुलन गड़बड़ाना स्वाभाविक है। यदि हम समाज का समग्र विकास चाहते है तो समृद्धि और संस्कृति में संतुलन साधना बेहद ज़रूरी है। यह संतुलन साधे बगैर समाज मै विकास की बात करना बेमानी होगा।

दरअसल , आज इस बात क्रो भी समझने की जरूरत है कि हम आखिर समृद्धि किस कीमत पर चाहते हैं। क्या अपनी परंपराओं को मिटाकर लाई जा रहीं तथाकथित समृद्धि की हमें जरूरत है? और अगर हमारा जवाब नकारात्मक है तो आखिर हमारे लिए विकास का रास्ता क्या हो ? आखिर कैसे हम अपनी संस्कृति को सुरक्षित रखते हुए समृद्धि की दिशा में बढ़ें? कैसे हम अपनी संस्कृति को ही समृद्धि के लिए उपयोग में ला सकें? ये कुछ ऐसे मसले हैं जिन पर बातचीत करने की आज जरूरत है।

स्वस्थ विकास तो मनुष्य के साथ- साथ जमीन , जल , जंगल और जानवर के विकास से भी जुड़ा है। इनकी उपेक्षा करके विकास की परिभाषा करेंगे तो वह टिकाऊ नहीं होगा। पर्यावरण की जिस समस्या से हम दो-चार हो रहे है वह और विकराल स्वरूप ग्रहण कर लेगी। जरूरत इस बात की है कि विकास पारिस्थिति को ध्यान में रखकर किया जाए, न कि अकेले मानव मात्र को ध्यान में रखकर पारिस्थितिकी में हर किसी की अपनी एक अलग और विशेष भूमिका है। अगर इस चक्र के किसी भी अंग को नुकसान हुआ तो चक्र का गड़बड़ाना तय है। विकास जब केवल मानव मात्र को ध्यान में रखकर करने की कोशिश की जाएगी तो यह सहज और स्वाभाविक है कि प्रकृति में जबर्दस्त असंतुलन कायम होगा और उसके दुष्परिणामों से मनुष्य बच नहीं पाएगा।

यदि विकास के पहिए को सही पटरी पर लाना है तो भूख और बेरोजगारी को मिटाना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। आज भी देश की एक बडी आबादी को दो वक्त की रोटी नहीं मिल पाती। ऐसे लोग भी अपने देश में है जो रात में भूखे पेट सोने को मजबूर है। उनकी इस स्थिति के लिए यदि हम विकास के मौजूदा माडल को दोषी ठहराएं तो गलत नहीं होगा। बेरोजगारी की मार से नौजवान बेहाल हैं। साफ तौर पर दिख रहा है कि सरकार के पास हर हाथ को रोजगार देने के लिए कारगर नीति का अभाव है। यह अभाव नया नहीँ है। हमें विकास की ऐसी अवधारणा पर काम करना होगा जिसमें हर हाथ को काम मिल सकें। इसके लिए हमें स्वरोजगार को बढाने की दिशा में भी काम करना होगा। आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़त्ते हुए नौजवानों में ऐसा आत्मविश्वास पैदा करना होया कि वे किसी का मुंह देखे बिना खुद अपने लिए रोजगार पैदा करते हुए प्रगति की राह पर आगे बढ़ सकें। अभी विकास के जिस माडल को लेकर हम चल रहे है उसमें गरीबी की रेखा तय की जाती है। इसका परिणाम सबके आमने है। मेरा मानना है कि सही मायने में अगर हम विकास चाहते है तो गरीबी की रेखा के बजाए समृद्धि की रेखा तय की जाए और उसी के मुताविक समयबद्ध कार्यक्रम लागू किए जाए। भारत के संदर्भ में अगर इम विकास की बात करते है तो हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि राजनैतिक सत्ता का विकेंद्रीकरण हो। ग्राम सभा को सभी स्तरों के निर्णय में सहभागी बनाया जाए। राजनैतिक सत्ता में आम सहमति की अवधारणा को हकीक़त में बदलने की ज़रूरत है। राजनीतिक दलों का रवैया प्रतिस्पर्धात्मक न होकर सकारात्मक होना चाहिए। इसके अलावा भारत के विकास के लिए चुनावों को बाहुबल और धनबल से मुक्त करने की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी| इसके लिए राजनैतिक दलों को उत्तरदायी बनाने की शुरुआत होनी चाहिए।

देश के समग्र विकास के लिए कर ढांचे को भी सुधारे जाते को जरूरत है। सरकार को चाहिए कि वह आमदनी की बजाए खर्च पर कर लगाने की शुरुआत करें। आर्थिक क्षेत्र में अपने देश में बहुत अव्यवस्था है। इसे सुधारने के लिए अन्य उपायों के साथ-साथ अनार्जित आय का परिभाषित एबं नियत्रित करना जरूरी है। न्यायपालिका सहित पूरे प्रशासनिक ढांचे को विकेन्द्रीकरण के जरिए जनता के प्रति जवाबदेह बनाना होगा।

समग्र विकास के लिए यह भी जरूरी है कि सामाजिक, सास्कृतिक और धार्मिक क्षेत्रों को स्वायत्तता दी जाए और उन्हें शक्ति संपन्न बनाकर सस्कारी नियत्रण से मुक्त किया जाए। ऐसा होने पर ही ये विकास की गति को बनाए रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान कर पाएंगे। हमें यह भी याद रखना होगा कि भारत के सामाजिक विकास में यहां के धर्मस्थलों की अहम भूमिका रही है। हमें उनकी सकारात्मक सहभागिता सुनिश्चित करनी होगी।

शिक्षा को व्यक्तित्व विकास केन्द्रित एवं जीवनोपयोगी बनाया जाना चाहिए शिक्षा ऐसी ज्ञानी चाहिए कि उससे एक स्वतंत्र और सकारात्मक सोच विकसित ही।

देशी चिकित्सा पद्धतियों को प्रोत्साहित किया जाए और उन्हें सक्षम बनाया जाए। अगर ऐसा किया जाएगा तो विकास को गति मिलनी तय है। हम सब जानते है कि बदलती जीवनशैली ने छोटे-बड़े रोगों का प्रकोप बढ़ा दिया है। आनन-फानन में हमें उपचार के लिए अंग्रेजी पद्धतियों का आश्रय लेना पड़ रहा है। इलाज कराते-कराते लोग कंगाल हो जाते हैं| लेकिन प्राय: उन्हें स्वास्थ्य लाभ नहीं मिल पाता। देशी चिकित्सा अपेक्षाकृत सस्ती और कई रोगों में ऐलोपैथी से अधिक कारगर है। हमें इस पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।

निष्कर्ष यह है कि भारत में सकल उत्पाद एवं आर्थिक वृद्धिदर के स्थान पर विकास का 'सुखमानक' तैयार करने की जरूरत है। तभी समग्र विकास होगा और इसका फायदा समाज के प्रत्येक वर्ग को मिल पाएगा।